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दम तोड़ रहा जिले का कालीन उद्योग
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करघे पर कालीन बुनती महिलाएं व युवतियां। संवाद
- फोटो : AURAIYA
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औरैया। जिले के फफूंद क्षेत्र में फलफूल रहा कालीन उद्योग शासन-प्रशासन के सुध न लेने से खत्म होने की कगार पर पहुंच चुका है। पहले कोरोना की मार और अब रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते विदेशों से भी मांग न होने से रोजी-रोटी के लाले पड़े हैं। वहीं, कर्ज का बोझ उतारने के लिए वह गोदाम में डंप माल कौड़ियों के भाव बेच रहे हैं। काफी संख्या में लोग रोजी-रोटी की जुगाड़ में कस्बे से पलायन भी कर गए हैं। यदि जल्द शासन प्रशासन ने ध्यान न दिया तो सिसकियां भर रहे कालीन उद्योग को खत्म होने से कोई नहीं बचा सकेगा।
कस्बा फफूंद में तैयार कालीनों की देश-विदेश में मांग होने के चलते यहां लगभग दो सौ करघों पर एक से बढ़कर एक नायाब कालीन तैयार किए जाते थे। कस्बे में बने कालीन मुंबई के बड़े-बड़े कारोबारियों के माध्यम से सीधे विदेशों को सप्लाई होते थे। पिछले दो सालों से कोरोना की मार के चलते ठप हुईं अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के कारण कालीन का कारोबार ठप हो गया।
ऐसे में इस व्यवसाय से जुड़े लगभग तीन सैकड़ा परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया था। हालांकि इस व्यवसाय से जुड़े लोगों ने किसी तरह से इधर-उधर से जीवनयापन किया। एक साल से कोरोना का प्रभाव शांत होने के बाद कालीन कारोबारियों में फिर से उम्मीद जगी तो वह माल तैयार करने में जुट गए। इसी बीच चार माह से चल रहे यूक्रेन-रूस युद्ध ने उनके अरमानों पर पूरी तरह से पानी फेर दिया। जिससे तीन सैकड़ा परिवारों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
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कस्बे के कालीन व्यापारी इब्राहिम खां ने बताया कि कोरोना के बाद मांग बढ़ने की उम्मीद हुई थी। इससे बंद करघों को नई डिजाइन के लिए शुरू किया, हालात अच्छे न होने के कारण दिल्ली, मुंबई, जयपुर, आगरा में कालीन कारोबारियों ने भी हाथ खड़े कर दिए। मजबूर होकर गोदामों में डंप लाखों का माल फुटकर में कौड़ियों के भाव बेचकर उधारी चुकानी पड़ी। इससे लंबा नुकसान हुआ है। अब वर्तमान में लगभग 15 करघे ही चल रहे हैं। जो बाहर के इक्का-दुक्का व्यापारियों के आर्डर पर माल तैयार कर रहे हैं। आर्थिक तंगी के कारण तमाम कारोबारी शहरों को चले गए।
मुख्य विकास अधिकारी अनिल कुमार सिंह ने कहा कि कालीन उद्योग को लेकर यहां कोई योजना नहीं है। विदेशों में सप्लाई बताई जा रही है। कोरोना की मार से कारोबार ठप हो रहा है। यदि उन्हें खादी ग्रामोद्योग से कोई लोन दिया भी जाए तो तैयार माल की खपत कहां करेंगे। फिलहाल अभी ऐसे लोगों के लिए कोई योजना जिले में नहीं है। शासन से यदि कोई योजना आती है तो कालीन उद्योग कारोबारियों को इसका लाभ दिलाया जाएगा।
अंतरराष्ट्रीय उड़ानें बंद होने से और हुई दिक्कत
कोरोना से पहले कस्बे के ऊंचा टीला, सरायं बिहारीदास, बाबा का पुरवा, भराव, सैयद बाड़ा आदि मोहल्लों में लगभग दो सौ कालीन करघे लगे थे। इससे लगभग तीन सौ परिवारों को रोजगार मुहैया था। कारीगर अधिकतर महिलाएं ही हैं। प्रति माह दस से बारह हजार रुपये कमाती थीं, लेकिन कोरोना में यूरोप, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के लिए उड़ान बंद होने के कारण कारोबार पर सीधा असर पड़ा। कोरोना में कारोबारियों की हालत खस्ता हो गई और सौ से अधिक करघे बंद हो गए। रही सही कसर यूक्रेन-रूस युद्ध ने पूरी कर दी।
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कस्बा फफूंद में तैयार कालीनों की देश-विदेश में मांग होने के चलते यहां लगभग दो सौ करघों पर एक से बढ़कर एक नायाब कालीन तैयार किए जाते थे। कस्बे में बने कालीन मुंबई के बड़े-बड़े कारोबारियों के माध्यम से सीधे विदेशों को सप्लाई होते थे। पिछले दो सालों से कोरोना की मार के चलते ठप हुईं अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के कारण कालीन का कारोबार ठप हो गया।
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ऐसे में इस व्यवसाय से जुड़े लगभग तीन सैकड़ा परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया था। हालांकि इस व्यवसाय से जुड़े लोगों ने किसी तरह से इधर-उधर से जीवनयापन किया। एक साल से कोरोना का प्रभाव शांत होने के बाद कालीन कारोबारियों में फिर से उम्मीद जगी तो वह माल तैयार करने में जुट गए। इसी बीच चार माह से चल रहे यूक्रेन-रूस युद्ध ने उनके अरमानों पर पूरी तरह से पानी फेर दिया। जिससे तीन सैकड़ा परिवारों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
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कस्बे के कालीन व्यापारी इब्राहिम खां ने बताया कि कोरोना के बाद मांग बढ़ने की उम्मीद हुई थी। इससे बंद करघों को नई डिजाइन के लिए शुरू किया, हालात अच्छे न होने के कारण दिल्ली, मुंबई, जयपुर, आगरा में कालीन कारोबारियों ने भी हाथ खड़े कर दिए। मजबूर होकर गोदामों में डंप लाखों का माल फुटकर में कौड़ियों के भाव बेचकर उधारी चुकानी पड़ी। इससे लंबा नुकसान हुआ है। अब वर्तमान में लगभग 15 करघे ही चल रहे हैं। जो बाहर के इक्का-दुक्का व्यापारियों के आर्डर पर माल तैयार कर रहे हैं। आर्थिक तंगी के कारण तमाम कारोबारी शहरों को चले गए।
मुख्य विकास अधिकारी अनिल कुमार सिंह ने कहा कि कालीन उद्योग को लेकर यहां कोई योजना नहीं है। विदेशों में सप्लाई बताई जा रही है। कोरोना की मार से कारोबार ठप हो रहा है। यदि उन्हें खादी ग्रामोद्योग से कोई लोन दिया भी जाए तो तैयार माल की खपत कहां करेंगे। फिलहाल अभी ऐसे लोगों के लिए कोई योजना जिले में नहीं है। शासन से यदि कोई योजना आती है तो कालीन उद्योग कारोबारियों को इसका लाभ दिलाया जाएगा।
अंतरराष्ट्रीय उड़ानें बंद होने से और हुई दिक्कत
कोरोना से पहले कस्बे के ऊंचा टीला, सरायं बिहारीदास, बाबा का पुरवा, भराव, सैयद बाड़ा आदि मोहल्लों में लगभग दो सौ कालीन करघे लगे थे। इससे लगभग तीन सौ परिवारों को रोजगार मुहैया था। कारीगर अधिकतर महिलाएं ही हैं। प्रति माह दस से बारह हजार रुपये कमाती थीं, लेकिन कोरोना में यूरोप, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के लिए उड़ान बंद होने के कारण कारोबार पर सीधा असर पड़ा। कोरोना में कारोबारियों की हालत खस्ता हो गई और सौ से अधिक करघे बंद हो गए। रही सही कसर यूक्रेन-रूस युद्ध ने पूरी कर दी।

तैयार कालीन दिखाते कारोबारी मुईन अंसारी। संवाद- फोटो : AURAIYA