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Auraiya News: अस्ता कांड के पीड़ितों की खोती जा रही न्याय की उम्मीद

Fri, 16 Feb 2024 12:42 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Fri, 16 Feb 2024 12:42 AM IST
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Asta incident victims are losing hope for justice
विवेक विश्नोई
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औरैया। सदर विकास खंड के गांव अस्ता में 26 मई 1984 को बेहमई कांड के बदले किए गए नरसंहार में मारे गए 12 लोगाें के परिजन व उनकी बेवाओं में उम्र बढ़ने के साथ ही न्याय की उम्मीद भी खोती जा रही है। 40 साल बीत चुके हैं, इस बीच आज भी कोर्ट में तो मामला चल रहा है, लेकिन पीड़ितों को न तो तारीखों का पता चलता है और न ही उनकी कोई सुध लेने वाला है।
अस्ता गांव में 26 मई 1984 को डकैत लालाराम, श्रीराम व कुसमा नाइन ने अपने 14-15 साथियों के साथ पूरे गांव को घेर कर 12 लोगाें को गोलियों से भून दिया था। यही नहीं उन्होंने पूरे गांव में आग लगा दी थी। उस समय अस्ता गांव इटावा जिले में आता था। घटना को लेकर आज भी न्याय की उम्मीद लगाए बैठीं मृतकों की बेवाओं व पीड़ितों से संवाद न्यूज एजेंसी ने गांव पहुंचकर बातचीत की।
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फोटो15एयूआरपी 18- मंगल सिंह निषाद

अस्ता गांव निवासी मंगल सिंह निषाद ने बताया कि 1984 में उनके पिता गंगाराम निषाद प्रधान थे। घटना के संबंध में बताते हुए कहते हैं कि वह उस दिन अपनी मां पार्वती देवी के साथ थे। लालराम, श्रीराम व कुसमा नाइन अपने साथियों के साथ आए। जहां उन्होंने गांव को घेर लिया। फरमान जारी किया कि प्रधान से पैसे दिलवाओ उससे हम हथियार खरीदेंगे, क्योंकि तुम लोगों ने फूलन को रुपये देकर खूब मदद की।
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बताया कि इस बीच डकैतों ने उनकी मां को पकड़ लिया और गांव वालों के सामने उन्हें निर्वस्त्र कर दिया। तभी उनमें से एक डकैत ने उन्हें गोली मारी, लेकिन किस्मत से वह गोली डकैतों के एक साथी को लग गई। इस पर सभी डकैत उसे देखने में लग गए। तभी वह मौका पाकर वहां से भाग निकले। जहां थोड़ी दूर दूसरे गांव सिखौली में लगे पीएसी के कैंप पर पहुंचकर इसकी जानकारी दी।
तब गांव पहुंचने के लिए नाव से यमुना नदी पार करनी पड़ती थी। इस बीच डकैतों ने गांव के 12 लोगों को एक साथ खड़ा करके गोलियों से भून दिया था। जब तक पीएसी गांव पहुंचती तब तक डकैतों ने गांव में आग लगा दी। सब कुछ तहस नहस हो गया था। बताया कि आज तक इसमें उन लोगों को कोई न्याय नहीं मिला।
न्याय मिलेगा कि नहीं पता नहीं

फोटो15एयूआरपी 19- रामदुलारी निषाद
उम्र के 85 वसंत देख चुकीं रामदुलारी उखड़ती आवाज में बताती हैं कि डकैतों ने गांव को घेरा और फिर किसी की कुछ नहीं सुनी। तड़ातड़ गोलियां चलाकर एक के बाद एक 12 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इस घटना में उनके पति धनीराम व उनके देवर व सोमवती के पति महादेव की मौत हो गई। इस घटना में आज तक उन्हें इंसाफ नहीं मिला। अब उम्र का क्या भरोसा, जिंदा रहते शायद न्याय मिलेगा भी नहीं कुछ पता नहीं।

फोटो15एयूआरपी 20- रामवती
इधर-उधर से व्यवस्था कर बच्चों को पाला
डकैती की गोलिंयों का शिकार हुए गांव निवासी रामशंकर की बेवा रामवती अपनी आपबीती सुनाते हुए रो पड़ी। 75 वर्षीय रामवती ने बताया कि 1984 में हुई इस घटना के बाद शासन प्रशासन ने पांच हजार रुपये दिए थे। छोटे-छोटे चार बच्चों को पालना मुश्किल हो गया। दिन भर एक-एक टुकड़ा इधर-उधर से व्यवस्था करके बच्चों को खिलाकर किसी तरह से दिन काटे। आज बच्चे बड़े हो गए हैं, उन्होंने अब घर का खर्च सब संभाल लिया है, लेकिन आज तक इस मामले में कोई न्याय नहीं मिल सका है।
बहुत ही वीभत्स था वह दिन

फोटो15एयूआरपी 21- बिटानी
लगभग 80 वर्षीय बिटानी कहतीं हैं कि डकैतों ने जब गांव घेर लिया। तो उन्होंने मेरे पुत्र आठ वर्षीय पुत्र रामआसरे को पकड़ लिया। वह रोती गिड़गिड़ाती रहीं। हालांकि बाद में दूसरे गांव जमालीपुर ले जाकर उसे छोड़ दिया। घटना को लेकर बताती हैं कि वह दिन बहुत ही वीभत्स था। डकैतों के कहर के बाद गांव में चारों तरफ चीख-पुकार ही सुनाई दे रही थी। सभी इधर-उधर भागकर अपनी जान बचाने में लगे हुए थे।

आज भी सिहर उठता है दिल

फोटो15 एयूआरपी 22- सूरजमुखी
80 वर्षीय सूरजमुखी बतातीं हैं कि बदमाश आए और उन्होंने गांव में जो भी दिखाई दिया उन्हें उनपर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। कुसमा नाइन ने गांव में आग लगा दी। इसमें उनका घर व सारा सामान जल गया था। घटना के बाद शासन ने नुकसान के तौर पर एक हजार रुपये व 12 टिन के तख्ते दिए थे। तख्ते आज भी छप्पर पर लगे हुए हैं। आज भी उस दिन को याद कर दिल सिहर उठता है।

इनसेट---
डकैतों की गोलियों से मारे गए ग्रामीण---
दर्शन सिंह, रामशंकर, लालाराम, छोटेलाल, धनीराम, महादेव, भीखालाल, शंकर, बांकेलाल, लक्ष्मीनरायन, शिव कुमारी व मुन्वेश।
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