ना फर्जी पहचान, ना घिसे फिंगरप्रिंट्स का झंझट: आ गया है भारत ABIS; क्या है यह और कैसे पकड़ेगा डुप्लीकेट आईडी?

जागृति शुक्ला
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्लीजागृति शुक्ला
Sat, 26 Sep 2026 02:39 PM IST
सार

अरबों के बायोमेट्रिक डेटा में से किसी एक व्यक्ति की सही पहचान खोजना चुनौतीपूर्ण काम माना जाता है। पहचान की स्पीड और एक्यूरेसी बनाए रखते हुए डुप्लीकेट आईडी की समस्या को खत्म करने के लिए यूआईडीएआई से जुड़े शोधकर्ताओं ने भारत ABIS विकसित किया है। यह एक ओपन-सोर्स मल्टी-मोडल बायोमेट्रिक सिस्टम है। आइए जानते हैं कि यह कैसे काम करता है और कितना असरदार है?

Bharat ABIS, India’s Open Source Biometric System Built Billion Scale Identity Verification
भारत एबीआईएस - फोटो : एआई जनरेटेड

    विस्तार

    किसी भी देश में पहचान वेरिफिकेशन के लिए बायोमेट्रिक डेटाबेस सबसे सुरक्षित माना जाता है। लेकिन, जब बात 1.5 अरब से अधिक आबादी वाले डेटाबेस की हो, तो मौजूदा सिस्टम भी अपनी सीमाओं तक पहुंचने लगते हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) के शोधकर्ताओं ने भारत ABIS (ऑटोमेटेड बायोमैट्रिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम) विकसित किया है। यह एक ओपन-सोर्स बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन सिस्टम है, जो मौजूदा टूल्स की तुलना में कहीं अधिक स्पीड और एक्यूरेसी (सटीकता) प्रदान कर सकता है।

    इस अध्ययन को टुवर्ड्स बिलियन-स्केल मल्टी-मॉडल बायोमेट्रिक सर्च शीर्षक के साथ प्रकाशित किया गया है। इस रिसर्च टीम में यूआईडीएआई के छह शोधकर्ता, IIIT हैदराबाद का एक शोधकर्ता और मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के बायोमेट्रिक्स शोधकर्ता अनिल जैन शामिल थे।

    क्या है Bharat ABIS?

    • एबीआईएस का पूरा नाम ऑटोमैटेड बायोमैट्रिक आईडेंटिफिकेशन सिस्टम है। यह एक ओपन-सोर्स मल्टी-मोडल बायोमेट्रिक सिस्टम है, जिसे बड़े पैमाने पर पहचान की डुप्लीकेशन जांच के लिए विकसित किया गया है।
    • यह सिस्टम किसी व्यक्ति के फिंगरप्रिंट, आईरिस और चेहरे से मिली जानकारी को प्रोसेस करके एक संयुक्त बायोमेट्रिक टेम्पलेट तैयार करता है। इस टेम्पलेट का आकार करीब 13.5KB प्रति व्यक्ति है। इसके बाद इस टेम्पलेट को डेटाबेस में मौजूद रिकॉर्ड्स से मैच किया जाता है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि उसी व्यक्ति की पहचान पहले से डेटाबेस में मौजूद है या नहीं।

    सिस्टम में तीनों बायोमेट्रिक को क्यों जोड़ा गया?

    • भारत एबीआईएस सिर्फ एक तरह के बायोमेट्रिक डेटा पर निर्भर नहीं है। यह फिंगरप्रिंट, आईरिस और फेस तीनों को मिलाकर पहचान करता है। सिस्टम जरूरत के हिसाब से किसी एक बायोमेट्रिक का इस्तेमाल भी कर सकता है, लेकिन तीनों को मिलाने से डुप्लीकेट पहचानने की क्षमता बेहतर होती है। शोध में भी अलग-अलग बायोमेट्रिक के मुकाबले इनके संयोजन से एक्यूरेसी में सुधार देखा गया है।
    • हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि इसके पीछे एक वजह यह भी है कि बड़े पैमाने के डेटाबेस में सभी लोगों के फिंगरप्रिंट हमेशा एक जैसी गुणवत्ता के नहीं होते। उम्रदराज लोगों या मैनुअल लेबर करने वाले लोगों के फिंगरप्रिंट घिसे हुए हो सकते हैं। ऐसे मामलों में दूसरे बायोमेट्रिक संकेतों को साथ इस्तेमाल करना मददगार हो सकता है।

    22 करोड़ रिकॉर्ड पर हुई टेस्टिंग

    • शोधकर्ताओं ने भारत एबीआईएस का मूल्यांकन 22 करोड़ पहचान वाले एक गैलरी डेटासेट पर किया। यह डेटा भारत के करीब 1.55 अरब आधार रिकॉर्ड्स से रैंडम तरीके से लिया गया था और इसमें अलग-अलग जनसांख्यिकीय समूहों को ध्यान में रखा गया था।
    • सिस्टम को ट्रेन करने के लिए इससे काफी छोटे डेटासेट का इस्तेमाल किया गया था। शोध के अनुसार फिंगरप्रिंट, फेस और आईरिस मॉडल के ट्रेनिंग सेट करीब एक लाख यूनिक पहचान के स्तर के थे। टेस्टिंग से पहले इस्तेमाल किए गए डेटा को डी-आइडेंटिफाई किया गया था।

    परफॉर्मेंस और एक्यूरेसी: कितना बेहतर है यह सिस्टम?

    • बायोमेट्रिक सिस्टम की सटीकता को बेहतर तरीके से समझने के लिए दो अहम मापदंड इस्तेमाल किए जाते हैं। एफपीआईआर और एफएनआईआर।
    • एफपीआईआर यानी फाल्स पॉजीटिव आईडेंटिफिकेशन रेट, यह उस स्थिति को बताता है जब सिस्टम किसी व्यक्ति को गलती से किसी दूसरे रिकॉर्ड के साथ मैच कर दे या डुप्लीकेट के तौर पर फ्लैग कर दे।
    • वहीं एफएनआईआर यानी फाल्स आईडेंटिफिकेशन रेट बताता है कि सिस्टम किसी वास्तविक डुप्लीकेट को पहचानने में कितनी बार चूक सकता है।

    एक सर्वर पर प्रति सेकंड 100 सर्च

    • भारत एबीआईएस की खासियत सिर्फ एक्यूरेसी तक सीमित नहीं है। शोधकर्ताओं ने इसकी सर्च स्पीड का भी परीक्षण किया।
    • अध्ययन के अनुसार, 8 एनवीडिया एच100 GPUs और 2TB रैम वाले एक सर्वर पर यह सिस्टम 4 करोड़ रिकॉर्ड की गैलरी में प्रति सेकंड 100 सर्च कर सकता है। शोध के मुताबिक 40 मिलियन रिकॉर्ड वाली गैलरी में एक हजार प्रोब्स को सर्च करने में करीब 10 सेकंड लगते हैं।
    • बड़े डेटाबेस को संभालने के लिए सिस्टम में एक शेड्यूलर भी है, जो अलग-अलग सर्वर्स के बीच सर्च वर्क को बांटने और कोऑर्डिनेट करने का काम करता है।

    बुजुर्गों और श्रमिकों के लिए काफी फायदेमंद

    • वहीं, भारत ABIS के साथ इस्तेमाल किया गया डीपप्रिंट फिंगरप्रिंट मॉडल भी रिसर्च में अहम हिस्सा है। अध्ययन के मुताबिक इसे मौजूदा वेंडर टूल्स के साथ मिलाने पर फिंगरप्रिंट ऑथेंटिकेशन फेल्योर की संख्या लगभग आधी हो सकती है।
    • इसका फायदा खास तौर पर उन लोगों को हो सकता है जिनके फिंगरप्रिंट की गुणवत्ता कम है। शोध में बुजुर्ग लोगों और मैनुअल लेबरर्स को ऐसे उदाहरणों के तौर पर बताया गया है।
    • शोधकर्ताओं के अनुसार, इससे रोजाना होने वाले लाखों ऑथेंटिकेशन ट्रांजैक्शन में अतिरिक्त सफल मैच हासिल करने में मदद मिल सकती है।

    किन देशों के लिए उपयोगी हो सकता है भारत एबीआईएस?

    • शोधकर्ताओं का कहना है कि ओपन-सोर्स होने की वजह से भारत एबीआईएस उन देशों के लिए भी उपयोगी हो सकता है जो कमर्शियल ABIS सिस्टम खरीदने का खर्च नहीं उठा सकते।
    • अध्ययन में 20 मिलियन से कम आबादी वाले 160 से ज्यादा देशों और स्वतंत्र क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है। हालांकि, यह शोधकर्ताओं का आकलन है, न कि इन देशों में सिस्टम के वास्तविक इस्तेमाल का दावा।

    अभी 1.5 अरब रिकॉर्ड पर पूरी तरह टेस्ट नहीं हुआ

    • भारत एबीआईएस के नतीजे बड़े पैमाने पर किए गए परीक्षणों में उत्साहजनक हैं, लेकिन इसे अभी सीधे पूरे आधार डेटाबेस पर इस्तेमाल होने वाला सिस्टम मानना जल्दबाजी हो सकती है।
    • शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि 1.55 अरब के पूरे डेटाबेस तक सिस्टम को स्केल करने का काम अभी जारी है और इसके लिए मॉडल डिजाइन, ट्रेनिंग और इंजीनियरिंग में आगे भी सुधार की जरूरत होगी। यानी भारत ABIS ने अरबों रिकॉर्ड वाले बायोमेट्रिक सिस्टम के लिए ओपन-सोर्स तकनीक की क्षमता जरूर दिखाई है, लेकिन इसे आधार जैसे पूरे विशाल डेटाबेस पर बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले और टेस्टिंग बाकी है।
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