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अफरोज ने कालीन के साथ बुनी महिलाओं की आत्मनिर्भरता
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अफरोज बेगम
- फोटो : AURAIYA
फफूंद (औरैया)। अफरोज का अर्थ रोशन करने वाला, प्रबुद्ध होता है। फफूंद क्षेत्र निवासी अफरोज बेगम ने अपने नाम को सार्थक करते हुए 50 से अधिक महिलाओं की जिंदगियां उन्हें आत्मनिर्भर बनाकर रोशन की हैं। क्षेत्र की महिलाओं और युवतियों को कालीन बनाने का हुनर सीखकर अफरोज ने उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाया है। यह महिलाएं उनकी मिसाल देती नहीं थकतीं।
फफूंद के भड़कुली ऊंचा टीला निवासी हलीम अंसारी की पत्नी अफरोज बताती है कि 25 वर्ष पहले उनकी शादी हुई थी। जब वह मायके से ससुराल आईं तो उनके हाथ में कालीन बनाने का हुनर था। हालांकि तब परिवार की बंदिशों के चलते वह काम नहीं कर पाईं।
इसके बाद घर के हालात और आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए उन्होंने कालीन की बुनाई शुरू की। फफूंद में पहले से कालीन का कारोबार होता था, लेकिन इस काम में महिलाएं काफी पीछे थीं। उन्होंने अपने घर पर कालीन बुनाई का काम शुरू किया तो आसपास की महिलाओं ने उनसे यह हुनर सीखने की इच्छा जाहिर की।
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उन्होंने शुरुआत में गांव की 10 महिलाओं को कालीन बुनना सिखाया। उनके साथ कालीन बनाने के कारोबार में जुट गईं। उनके बनाए हुए कालीन देश ही नहीं विदेश तक पहचान बनाने लगे। धीरे-धीरे और महिलाएं जुड़ीं। कोरोना काल के पहले तक वह 50 महिलाओं को कालीन बुनने का हुनर सिखा कर आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। हालांकि कोरोना काल से कारोबार प्रभावित हुआ है।
15 दिन में बनती एक कालीन, हजारों की कमाई
अफरोज बताती हैं कि कालीन कारोबार से जुड़कर फफूंद के काफी लोग रोजगार को बढ़ावा दे रहे हैं। उनकी सिखाईं 50 महिलाएं आत्मनिर्भर हुई हैं। एक कालीन बुनने में दो से तीन महिलाएं लगती हैं। करीब 10 से 15 दिन में कालीन बनकर तैयार होता है। इसके लिए महिलाओं को आठ से 10 हजार रुपये मेहनताना मिलता है।
सब पढ़ें, सब बढ़ें की राह पर बेटियां
कालीन बुनने का हुनर सीख कर गांव की कई बेटियां खुद ही अपनी पढ़ाई का खर्चा उठा रहीं हैं। साथ ही परिवार को भी आर्थिक रूप से मदद दे रही हैं। पढ़ाई के साथ हुनर पाकर बेटियों ने सब पढ़ें, सब बढ़ें के सपने को साकार किया है।
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फफूंद के भड़कुली ऊंचा टीला निवासी हलीम अंसारी की पत्नी अफरोज बताती है कि 25 वर्ष पहले उनकी शादी हुई थी। जब वह मायके से ससुराल आईं तो उनके हाथ में कालीन बनाने का हुनर था। हालांकि तब परिवार की बंदिशों के चलते वह काम नहीं कर पाईं।
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इसके बाद घर के हालात और आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए उन्होंने कालीन की बुनाई शुरू की। फफूंद में पहले से कालीन का कारोबार होता था, लेकिन इस काम में महिलाएं काफी पीछे थीं। उन्होंने अपने घर पर कालीन बुनाई का काम शुरू किया तो आसपास की महिलाओं ने उनसे यह हुनर सीखने की इच्छा जाहिर की।
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उन्होंने शुरुआत में गांव की 10 महिलाओं को कालीन बुनना सिखाया। उनके साथ कालीन बनाने के कारोबार में जुट गईं। उनके बनाए हुए कालीन देश ही नहीं विदेश तक पहचान बनाने लगे। धीरे-धीरे और महिलाएं जुड़ीं। कोरोना काल के पहले तक वह 50 महिलाओं को कालीन बुनने का हुनर सिखा कर आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। हालांकि कोरोना काल से कारोबार प्रभावित हुआ है।
15 दिन में बनती एक कालीन, हजारों की कमाई
अफरोज बताती हैं कि कालीन कारोबार से जुड़कर फफूंद के काफी लोग रोजगार को बढ़ावा दे रहे हैं। उनकी सिखाईं 50 महिलाएं आत्मनिर्भर हुई हैं। एक कालीन बुनने में दो से तीन महिलाएं लगती हैं। करीब 10 से 15 दिन में कालीन बनकर तैयार होता है। इसके लिए महिलाओं को आठ से 10 हजार रुपये मेहनताना मिलता है।
सब पढ़ें, सब बढ़ें की राह पर बेटियां
कालीन बुनने का हुनर सीख कर गांव की कई बेटियां खुद ही अपनी पढ़ाई का खर्चा उठा रहीं हैं। साथ ही परिवार को भी आर्थिक रूप से मदद दे रही हैं। पढ़ाई के साथ हुनर पाकर बेटियों ने सब पढ़ें, सब बढ़ें के सपने को साकार किया है।

कालीन बुनतीं महिलाएं। संवाद- फोटो : AURAIYA