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धान की फसल में तेज धूप के कारण बढ़ा रोगों का खतरा
Updated Tue, 12 Sep 2017 11:03 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
औरैया। धान की फसल प्रगति पर है। ऐसे मौसम में फसल पर कीटों का प्रकोप भी बढ़ जाता है। इस समय तेज धूप भी आफत बनी हुई है, लिहाजा किसानों को कीटों से बचाव के उपाय करने की जरूरत है। कृषि वैज्ञानिक, किसानों को बचाव की एडवाइजरी जारी कर रहे हैं।
सितंबर के दूसरे सप्ताह तक तना छेदक कीट का सर्वाधिक प्रकोप धान की फसल में होता है। ये कीट पीले रंग के होते हैं तथा पंखों पर काला धब्बा होता है। नर्सरी के समय से ही ये कीट धान की पत्तियों के ऊपरी भाग पर झुंड में अंडे देती हैं। बाद में अंडे से लार्वा निकलकर पौधों के मध्य भाग में प्रवेश कर तने को काट देती हैं। जिससे पौध सूख जाते हैं।
कृषि वैज्ञानिक आईपी सिंह ने बताया कि इस कीट के नियंत्रण के लिए खड़ी फसल में मोनोक्रोटोफाश (36 प्रतिशत एमएल) की एक लीटर मात्रा 800-1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। इसके अलावा धान में दूसरा प्रमुख रोग पत्तीलपेटक है। यह सूड़ी कीट के प्रभाव से होता है। यह कीट पत्तियों पर नालीनुमा संरचना बना लेती है और हरियाली को खुरच कर खाती रहती है। बाद में पत्तियां सफेद और सूखी दिखाई पड़ने लगती हैं। इस रोग से बचाव के लिए क्यूनालफॉस (25 प्रतिशत ईसी) डेढ़ लीटर मात्रा 800-1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव किया जा सकता है। यह रसायन धान में हिस्पा रोग लगने पर भी इसी मात्रा से प्रयोग किया जा सकता है, जबकि फुदका से बचाव के लिए 25 किलो कार्बोफ्यूरान प्रति हेक्टेयर की दर से फसल में छीटकर बोआई करना चाहिए। इसके इतर डाइक्लोरोवाश (76 प्रतिशत ईसी) पौन लीटर मात्रा 800-1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव किया जा सकता है।
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इनसेट-
फुदका की पहचान
यह कीट हरे रंग का भुनगे जैसा छोटा होता है। फसल में नीचे की तरफ चिपककर उसका रस चूस लेता है, इससे फसल पीली दिखती है।
इनसेट
उप कृषि निदेशक विजय कुमार ने बताया कि धान की फसल को रोगों से बचाव के लिए उपयुक्त रसायन विकास खंडों पर स्थित कृषि रक्षा केंद्रों पर उपलब्ध है।
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औरैया। धान की फसल प्रगति पर है। ऐसे मौसम में फसल पर कीटों का प्रकोप भी बढ़ जाता है। इस समय तेज धूप भी आफत बनी हुई है, लिहाजा किसानों को कीटों से बचाव के उपाय करने की जरूरत है। कृषि वैज्ञानिक, किसानों को बचाव की एडवाइजरी जारी कर रहे हैं।
सितंबर के दूसरे सप्ताह तक तना छेदक कीट का सर्वाधिक प्रकोप धान की फसल में होता है। ये कीट पीले रंग के होते हैं तथा पंखों पर काला धब्बा होता है। नर्सरी के समय से ही ये कीट धान की पत्तियों के ऊपरी भाग पर झुंड में अंडे देती हैं। बाद में अंडे से लार्वा निकलकर पौधों के मध्य भाग में प्रवेश कर तने को काट देती हैं। जिससे पौध सूख जाते हैं।
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कृषि वैज्ञानिक आईपी सिंह ने बताया कि इस कीट के नियंत्रण के लिए खड़ी फसल में मोनोक्रोटोफाश (36 प्रतिशत एमएल) की एक लीटर मात्रा 800-1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। इसके अलावा धान में दूसरा प्रमुख रोग पत्तीलपेटक है। यह सूड़ी कीट के प्रभाव से होता है। यह कीट पत्तियों पर नालीनुमा संरचना बना लेती है और हरियाली को खुरच कर खाती रहती है। बाद में पत्तियां सफेद और सूखी दिखाई पड़ने लगती हैं। इस रोग से बचाव के लिए क्यूनालफॉस (25 प्रतिशत ईसी) डेढ़ लीटर मात्रा 800-1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव किया जा सकता है। यह रसायन धान में हिस्पा रोग लगने पर भी इसी मात्रा से प्रयोग किया जा सकता है, जबकि फुदका से बचाव के लिए 25 किलो कार्बोफ्यूरान प्रति हेक्टेयर की दर से फसल में छीटकर बोआई करना चाहिए। इसके इतर डाइक्लोरोवाश (76 प्रतिशत ईसी) पौन लीटर मात्रा 800-1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव किया जा सकता है।
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फुदका की पहचान
यह कीट हरे रंग का भुनगे जैसा छोटा होता है। फसल में नीचे की तरफ चिपककर उसका रस चूस लेता है, इससे फसल पीली दिखती है।
इनसेट
उप कृषि निदेशक विजय कुमार ने बताया कि धान की फसल को रोगों से बचाव के लिए उपयुक्त रसायन विकास खंडों पर स्थित कृषि रक्षा केंद्रों पर उपलब्ध है।