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गुरुकुल में गढ़ी जा रहीं ‘विदुषी-वीरांगनाएं’
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रजबपुर के गुरुकुल चोटीपुरा महाविद्यालय में निशाना लगातीं तीरंदाजी खिलाड़ी।
- फोटो : JPNAGAR
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अमरोहा। ...एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों। ऐसे ही जज्बे के साथ डॉ. सुमेधा ने तेरह वर्ष की उम्र में महिलाओं को वीरांगना, विदुषी बनाने का संकल्प लिया था। उन्होंने आजीवन गृहस्थ जीवन से दूर रखकर अपनी मंजिल पाने को गुरुकुल की नींव रखी। कई प्रांतों की सैकड़ों बेटियों के भीतर कुछ कर गुजरने का जज्बा भरा। अब सुमेधा के गुरुकुल में गढ़ी जा रहीं विदुषी और वीरांगनाएं देश-दुनिया में अमरोहा का नाम रोशन कर रही हैं। ये ही वजह है की तीरंदाजी और योगासन की धुरंधर बेटियों ने 500 से अधिक मेडल झटक कर देश-दुनिया में अपना नाम रोशन किया है। बारह से अधिक बेटियों ने सरकारी नौकरी हासिल की, तो कई बेटियों ने पीएचडी, नेट जेआरएफ को क्लियर कर बुलंदियों को छुआ है।
अमरोहा में रजबपुर क्षेत्र के एक छोटे से गांव चोटीपुरा में जन्मीं सुमेधा के पिता हरगोविंद सिंह पेशे से किसान थे। वह आर्य समाज से भी जुड़े थे। सुमेधा तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं। पिता ने कक्षा तीन के बाद सुमेधा आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली-हरियाणा बार्डर पर बसे गुरुकुल में भेज दिया। यहां पर सुमेधा की होनहार व्यक्तित्व को देखकर गुरुकुल प्रबंधन ने उन्हें सीधे कक्षा छह में प्रवेश दिया। यहां से इंटर तक पढ़ाई करने के बाद सुमेधा ने हरिद्वार स्थित गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय से संस्कृत में एमए और पीएचडी की। महिलाओं पर होने वाले अत्याचार और उत्पीड़न के हादसे सुमेधा को बहुत उद्वेलित करते थे। इसके चलते उन्होंने महज तेरह वर्ष की उम्र में ही महिला सशक्तीकरण के लिए अभियान चलाने का संकल्प लिया। पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वह अपने गांव लौटीं तो पिता ने उनके सामने शादी का प्रस्ताव रखा। सुमेधा ने गृहस्थी को अपने लक्ष्य में रोड़ा माना और आजीवन विवाह न करने का फैसला लिया। उन्होंने अपने पिता से शादी में होने वाले खर्च के बदले गुरुकुल विद्यालय खोलने के लिए कहा। बेटी के जज्बे को देखकर पिता ने वर्ष 1988 में चोटीपुरा में ही गुरुकुल विद्यालय की स्थापना की। शुरुआत में छह बेटियों के दाखिले के साथ शुरू हुआ महाविद्यालय में महाराष्ट्र, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, झारखंड, बिहार समेत 11 प्रांतों की करीब 800 बेटियों की जीवन संवार रही हैं। गुरुकुल में लगभग 45 अध्यापक हैं, जिनमें तीन को छोड़कर शेष महिलाएं हैं। यहां प्रवेश लेने वाली बेटियों के लिए हॉस्टल व्यवस्था है। यहां सुबह योगाभ्यास के साथ शुरू हुई दिनचर्या पूरे दिन पढ़ाई और विभिन्न खेलों के साथ शाम को प्रार्थना के साथ समाप्त होती है।
तीरंदाजी और योगासन में रचा इतिहास
अमरोहा। डॉ. सुमेधा ने गुरुकुल में धनुर्विद्या सिखाने की नई पहल शुरू की। इसमें पारंगत बेटियों ने देश-विदेश में अपना हुनर दिखाते हुए अब तक लगभग 450 मेडल हासिल किए हैं। इनमें से सुमंगला ने एथेंस में आयोजित ओलंपिक गेम्स में पांचवीं रैंक हासिल कर विश्व में अमरोहा का नाम रोशन किया था। इसके लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सैफई में सुमंगला को रानी लक्ष्मीबाई अवार्ड से सम्मानित किया था। वहीं योगासन में बेटियों ने 50 मेडल झटके हैं।
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सुमेधा के संकल्प में शामिल हुईं सात और बहनें
अमरोहा। गुरुकुल चोटीपुरा की प्राचार्य सुमेधा के त्याग देखकर महाविद्यालय में पढ़ाने वाली डॉ. अमिता, डॉ. कल्पना, डॉ. सविता, डॉ. सुषमा, डॉ. रुचि, डॉ. मीनाक्षी उनके संकल्प पर निकल पड़ी हैं। सभी बहनों ने खुद को आजीवन गृहस्थ जीवन से दूर रखकर उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़े रहने का संकल्प लिया है।
समाज में महिलाओं के उत्पीड़न, शोषण और दुष्कर्म जैसी घटनाएं मन को झकझोर देती हैं। इसीलिए मेरी जिंदगी का मकसद अपने गुरुकुल के माध्यम से बेटियों को मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत बनाना है। वह अपनी रक्षा करने में समर्थ हो और अन्य महिलाओं का भी सहारा बन सकें। हमारा प्रयास बेटियों को विदुषी और वीरांगना बनाना है। मैं जल्द ही मजबूर और बेसहारा महिलाओं के लिए एक प्लेटफार्म तैयार करूंगी।
- डॉ. सुमेधा, प्राचार्य, गुरुकुल चोटीपुरा
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अमरोहा में रजबपुर क्षेत्र के एक छोटे से गांव चोटीपुरा में जन्मीं सुमेधा के पिता हरगोविंद सिंह पेशे से किसान थे। वह आर्य समाज से भी जुड़े थे। सुमेधा तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं। पिता ने कक्षा तीन के बाद सुमेधा आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली-हरियाणा बार्डर पर बसे गुरुकुल में भेज दिया। यहां पर सुमेधा की होनहार व्यक्तित्व को देखकर गुरुकुल प्रबंधन ने उन्हें सीधे कक्षा छह में प्रवेश दिया। यहां से इंटर तक पढ़ाई करने के बाद सुमेधा ने हरिद्वार स्थित गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय से संस्कृत में एमए और पीएचडी की। महिलाओं पर होने वाले अत्याचार और उत्पीड़न के हादसे सुमेधा को बहुत उद्वेलित करते थे। इसके चलते उन्होंने महज तेरह वर्ष की उम्र में ही महिला सशक्तीकरण के लिए अभियान चलाने का संकल्प लिया। पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वह अपने गांव लौटीं तो पिता ने उनके सामने शादी का प्रस्ताव रखा। सुमेधा ने गृहस्थी को अपने लक्ष्य में रोड़ा माना और आजीवन विवाह न करने का फैसला लिया। उन्होंने अपने पिता से शादी में होने वाले खर्च के बदले गुरुकुल विद्यालय खोलने के लिए कहा। बेटी के जज्बे को देखकर पिता ने वर्ष 1988 में चोटीपुरा में ही गुरुकुल विद्यालय की स्थापना की। शुरुआत में छह बेटियों के दाखिले के साथ शुरू हुआ महाविद्यालय में महाराष्ट्र, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, झारखंड, बिहार समेत 11 प्रांतों की करीब 800 बेटियों की जीवन संवार रही हैं। गुरुकुल में लगभग 45 अध्यापक हैं, जिनमें तीन को छोड़कर शेष महिलाएं हैं। यहां प्रवेश लेने वाली बेटियों के लिए हॉस्टल व्यवस्था है। यहां सुबह योगाभ्यास के साथ शुरू हुई दिनचर्या पूरे दिन पढ़ाई और विभिन्न खेलों के साथ शाम को प्रार्थना के साथ समाप्त होती है।
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तीरंदाजी और योगासन में रचा इतिहास
अमरोहा। डॉ. सुमेधा ने गुरुकुल में धनुर्विद्या सिखाने की नई पहल शुरू की। इसमें पारंगत बेटियों ने देश-विदेश में अपना हुनर दिखाते हुए अब तक लगभग 450 मेडल हासिल किए हैं। इनमें से सुमंगला ने एथेंस में आयोजित ओलंपिक गेम्स में पांचवीं रैंक हासिल कर विश्व में अमरोहा का नाम रोशन किया था। इसके लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सैफई में सुमंगला को रानी लक्ष्मीबाई अवार्ड से सम्मानित किया था। वहीं योगासन में बेटियों ने 50 मेडल झटके हैं।
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सुमेधा के संकल्प में शामिल हुईं सात और बहनें
अमरोहा। गुरुकुल चोटीपुरा की प्राचार्य सुमेधा के त्याग देखकर महाविद्यालय में पढ़ाने वाली डॉ. अमिता, डॉ. कल्पना, डॉ. सविता, डॉ. सुषमा, डॉ. रुचि, डॉ. मीनाक्षी उनके संकल्प पर निकल पड़ी हैं। सभी बहनों ने खुद को आजीवन गृहस्थ जीवन से दूर रखकर उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़े रहने का संकल्प लिया है।
समाज में महिलाओं के उत्पीड़न, शोषण और दुष्कर्म जैसी घटनाएं मन को झकझोर देती हैं। इसीलिए मेरी जिंदगी का मकसद अपने गुरुकुल के माध्यम से बेटियों को मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत बनाना है। वह अपनी रक्षा करने में समर्थ हो और अन्य महिलाओं का भी सहारा बन सकें। हमारा प्रयास बेटियों को विदुषी और वीरांगना बनाना है। मैं जल्द ही मजबूर और बेसहारा महिलाओं के लिए एक प्लेटफार्म तैयार करूंगी।
- डॉ. सुमेधा, प्राचार्य, गुरुकुल चोटीपुरा

डॉ सुमेधा, प्राचार्या गुरुकुल चोटीपुरा महाविद्यालय।- फोटो : JPNAGAR