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Amroha News: दीपदान से जगमग हुई गंगा, मुख्य स्नान आज
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तिगरीधाम। कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी पर रविवार को सूर्यास्त के समय दीपदान से गंगा नगरी जगमगा उठी। महाभारत काल से चली आ रही इस परंपरा के तहत श्रद्धालुओं ने नम आंखों से पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए दीये जलाकर गंगा को दान किए। विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान भी किए गए। गंगा का किनारा ऐसा लगने लगा जैसे आकाश से तारे उतर आए हो। ये सिलसिला काफी देर तक चला रहा।
ऐतिहासिक-पौराणिक कार्तिक पूर्णिमा मेले को मिनी कुंभ भी कहा जाता है। जिसमें गंगा किनारे लाखों श्रद्धालु पड़ाव डालकर विभिन्न धार्मिक आयोजन करने के साथ ही गंगा में आस्था की डुबकी लगाते हैं। इस मेले का सबसे अहम पर्व चतुर्दशी को मनाया जाता है, जिसमें श्रद्धालु वर्ष भर में मृतक अपने परिजनों की आत्मा की शांति के लिए गंगा में दीपदान करते हैं। पूर्वजों की मानें तो महाभारत युद्ध में मारे गए हजारों सैनिक और असंख्य योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों की मौजूदगी में सर्वप्रथम चतुर्दशी को दीपदान किया था, तब से यह परंपरा चल रही है।
रविवार की शाम सूर्यास्त होते ही तिगरी हजारों श्रद्धालु दीपदान के लिए घाट पर पहुंच गए और नम आंखों से दीपदान का सिलसिला शुरू हो गया। जो देररात तक जारी रहा। अपने सगे संबंधी और परिजनों से बिछड़े लोगों को याद कर लोगों की आंखें भर आईं। इस परंपरा को निभाते वक्त गंगा घाट आसमान में तारों जैसा दिखाई देने लगा। कुछ श्रद्घालु जाम में फंसने के कारण सूर्य अस्त होने के काफी देर बाद तिगरी गंगाघाट पहुंच पाए। इसके बाद दीपदान किया। दीपदान के बाद पुरोहितों को वस्त्र, अन्न एवं दक्षिणा आदि का दान भी किया।
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दीपदान का महत्व
मान्यता है कि महाभारत युद्ध में मारे गए हजारों सैनिक और असंख्य योद्धाओं की आत्मा शांति के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों की मौजूदगी में सर्वप्रथम चतुर्दशी को दीपदान किया था, तब से यह परंपरा चल रही है। तभी से कार्तिक पूर्णिमा पर तिगरी धाम लगने वाले ऐतिहासिक मेले के मुख्य स्नान से एक दिन चतुर्दशी पर अपने पितरों का तर्पण करते हैं। यह दीपदान वही लोग करते हैं, जिनके सगे संबंधी एक वर्ष के अंदर उन्हें छोड़कर परम पिता परमेश्वर की शरण में चले गए हैं। बताया कि गंगा में स्नान करने के बाद सूर्यास्त के समय दीपदान करें। गंगा में दीपदान करने से मृत आत्माओं को शांति मिलती है।
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ऐतिहासिक-पौराणिक कार्तिक पूर्णिमा मेले को मिनी कुंभ भी कहा जाता है। जिसमें गंगा किनारे लाखों श्रद्धालु पड़ाव डालकर विभिन्न धार्मिक आयोजन करने के साथ ही गंगा में आस्था की डुबकी लगाते हैं। इस मेले का सबसे अहम पर्व चतुर्दशी को मनाया जाता है, जिसमें श्रद्धालु वर्ष भर में मृतक अपने परिजनों की आत्मा की शांति के लिए गंगा में दीपदान करते हैं। पूर्वजों की मानें तो महाभारत युद्ध में मारे गए हजारों सैनिक और असंख्य योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों की मौजूदगी में सर्वप्रथम चतुर्दशी को दीपदान किया था, तब से यह परंपरा चल रही है।
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रविवार की शाम सूर्यास्त होते ही तिगरी हजारों श्रद्धालु दीपदान के लिए घाट पर पहुंच गए और नम आंखों से दीपदान का सिलसिला शुरू हो गया। जो देररात तक जारी रहा। अपने सगे संबंधी और परिजनों से बिछड़े लोगों को याद कर लोगों की आंखें भर आईं। इस परंपरा को निभाते वक्त गंगा घाट आसमान में तारों जैसा दिखाई देने लगा। कुछ श्रद्घालु जाम में फंसने के कारण सूर्य अस्त होने के काफी देर बाद तिगरी गंगाघाट पहुंच पाए। इसके बाद दीपदान किया। दीपदान के बाद पुरोहितों को वस्त्र, अन्न एवं दक्षिणा आदि का दान भी किया।
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दीपदान का महत्व
मान्यता है कि महाभारत युद्ध में मारे गए हजारों सैनिक और असंख्य योद्धाओं की आत्मा शांति के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों की मौजूदगी में सर्वप्रथम चतुर्दशी को दीपदान किया था, तब से यह परंपरा चल रही है। तभी से कार्तिक पूर्णिमा पर तिगरी धाम लगने वाले ऐतिहासिक मेले के मुख्य स्नान से एक दिन चतुर्दशी पर अपने पितरों का तर्पण करते हैं। यह दीपदान वही लोग करते हैं, जिनके सगे संबंधी एक वर्ष के अंदर उन्हें छोड़कर परम पिता परमेश्वर की शरण में चले गए हैं। बताया कि गंगा में स्नान करने के बाद सूर्यास्त के समय दीपदान करें। गंगा में दीपदान करने से मृत आत्माओं को शांति मिलती है।