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आपदा को अवसर बनाया, अमरोहा में ताइवानी अमरूद उगाया

Moradabad  Bureau मुरादाबाद ब्यूरो
Updated Wed, 09 Sep 2020 01:36 AM IST
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अतरासी रोड स्थित खालकपुर खुर्द में अपने ताइवान प्रजाति के अमरूद के बाग में विशाल चौधरी - फोटो : JPNAGAR
अमरोहा। कोरोना काल में नौकरी पर संकट के बीच युवाओं के लिए विशाल चौधरी की पहल एक मिसाल बन सकती है। परास्नातक की पढ़ाई करने वाले 24 वर्षीय विशाल ने आपदा को अवसर में बदल दिया। लॉकडाउन में नौकरी की गुंजाइश खत्म होने पर ताइवान प्रजाति के अमरूद की वैज्ञानिक खेती शुरू कर दी। अब पेड़ों पर फल में आने शुरू हो गए हैं। अमरोहा वासियों को ताइवान के अमरूद का स्वाद भी मिलने लगा है। फिलहाल उनके बाग से रोजाना चार से पांच किलो अमरूद निकल रहे हैं। उन्हें इससे सालाना बारह लाख रुपये की आय होने की उम्मीद है। वह अमरूद के एक्सपोर्ट के लिए योजना बना रहे हैं।
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अतरासी रोड स्थित खालकपुर खुर्द के रहने वाले विजेंद्र सिंह और वीरेश देवी के सबसे बड़े बेटे विशाल चौधरी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए किया है। इसके बाद इग्नू से एमए (लोक प्रशासन) किया। इस बीच दिल्ली के अर्थशास्त्र और सांख्यिकी विभाग में संविदा पर नौकरी शुरू की। लेकिन काम से संतुष्टि नहीं मिली। दिसंबर 2019 में घर लौट आए। फरवरी में दिल्ली जाने वाले थे, लेेकिन देेश में कोरोना ने दस्तक देना शुरू कर दिया। दोस्तों और परिवार के लोगों ने घर में रहने की सलाह दी। नौकरी की गुंजाइश खत्म होने पर विशाल ने इस आपदा को अवसर में बदलने की ठान ली। बकौल विशाल, नौकरी के दौरान ही यू ट्यूब से कई वीडियो देखे थे। हार्टीकल्चर में अमरूद की खेती के डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) से जानकारी ली। इसके बाद उन्होंने ताइवान के अमरूद की खेती की योजना बनाई। बिहार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, आईआईएचआर बंगलूरू, दक्षिण भारत के कई अन्य विश्वविद्यालयों के यू ट्यूब पर वीडियो से वैज्ञानिक तकनीक को आजमाया। उन्होंने आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा से ताइवान प्रजाति के अमरूद के 1450 पौधे लाकर अपने निर्माणाधीन मैरिज हॉल की आधा हेक्टेयर जमीन में लगाए। इस काम में एक लाख रुपये खर्च हुए।
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- ताइवान प्रजाति का अमरूद अच्छी वैरायटी का है। यह अंदर से पिंक भी होता है। बहुत कम जगह में पौधे को रोप सकते हैं। बागवानी में कॅरियर बनाने वाले लोग इसकी खेती कर सकते हैं। बागवानी करने वाले लोग विकास भवन स्थित जिला उद्यान कार्यालय में रजिस्ट्रेशन कराएं। सरकारी सहायता को उपलब्ध कराई जाएगी।
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- एसके गुप्त, उप निदेशक उद्यान, मुरादाबाद
सुपर मार्केट में 150 से 200 रुपये किलो, वजन 300 से 700 ग्राम तक
अमरोहा। बकौल विशाल ताइवान प्रजाति के अमरूद 10 से 15 दिन तक रख सकते हैं। यह महानगरों के सुपर मार्केट में 150 से 200 किलो तक बिक सकता है। इसके अलावा अमरूद का वजन 300 से 700 ग्राम तक रहेगा। अमरूद गुलाबी और सफेद हैं। फिलहाल अमरूद 100 रुपये किलो बेच रहे हैं।
फोमनेट और एंटी फॉग पॉलीथिन से अमरूद की हिफाजत
अमरोहा। अमरूद के फल को कीट से बचाने के लिए वैैज्ञानिक तकनीक को आजमा रहे हैं। फल के गोल आकार के लिए फोम नेट लगा देते हैं, जबकि कीट पतंग से छुटकारा के लिए एंटी फॉग पॉलीथिन लगाया है, जिसे तीन जगहों से छेद किया गया है। ताकि हवा का प्रवाह बना रहे हैं। इसे गुजरात से मंगाया है फोम की कीमत 80 पैसे हैं। जबकि एंटी फॉग पॉलीथिन 150 रुपये किलो हैं। इसमें 300 से 400 पीस है। अखबार से ढकते भी हैं ताकि प्राकृतिक रंग बना रहे।
क्वालिटी के लिए एक डाली पर दो से चार अमरूद
अमरोहा। अमरूद की क्वालिटी को बेहतर रखने के लिए पेड़ की डालियों से अतिरिक्त अमरूद को तोड़ देते हैं। अमूमन एक शाखा में दो से चार अमरूद के फल को बेहतर माना जाता है। वहीं इस प्रजाति के अमरूद के पेड़ की ऊंचाई को सात फीट तक रखना है। विशाल के पेड़ अभी तीन से चार फीट तक हैं। पौधों के लिए पांच गुणा सात फीट पर रोपा गया है।
कटाई-छटाई जरूरी वरना जंगल बनने की आशंका
अमरोहा। अमरूद के पौधे को पास पास लगाने से फायदा मिलेगा। इससे फलों का उत्पादन 10 गुना हो सकता है। वहीं पेड़ की कटाई छटाई जरूरी है। ताकि ज्यादा फल आएं। वरना जंगल बनने का खतरा है यहां से केवल लकड़ी मिलेगी। पेड़ के अवशेष को जमीन में गिरा देते हैं। कुछ दिन के बाद यह खाद बन जाता है।
आठ महीने में फल आना शुरू
ताईवान की प्रजाति के अमरूद अधिकतम आठ महीने में तैयार हो जाते हैं। फिलहाल पर्यावरण अनुकूल होने पर फल आने शुष् हो गए हैं। छह महीने के अंदर में भी फल तैयार होने लगा है। रोजाना चार से पांच किलो अमरूद बाग से मिलने लगे हैं।

फल के लिए मधुमक्खी के बॉक्स और गेंदा को लगाया
अमरोहा। मधुमक्खी और गेंदा के पौधे को पेड़ के बीच में लगाया है। विशाल ने बताया कि मधुमक्खी पारगमन करती हैं। इससे फल पेड़ पर रुक जाता है। वरना कीट के प्रभाव से झड़ जाते हैं। फल में 80 प्रतिशत पारगमन मधुमक्खी से होता है। 10 प्रतिशत हवा जबकि 10 प्रतिशत अन्य पक्षियों से होता है। गेंदा के पौधे को रोपना भी जरूरी है। यह नीमेटेेड को नियंत्रित रखता है। वरना पेड़ की जड़ को कीट सुखा देते हैं। गांठ बन जाती है। इससे पेड़ अपने लिए भोजन को नहीं बना पाता है।
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