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रामसर जोन में कब्जे और खनन की वजह से असुरक्षित हैं वन्यजीव
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अमर उजाला ब्यूरो
गजरौला (अमरोहा)। वन्य जीवों के लिए सुरक्षित माने जाने वाली हस्तिनापुर वन्य क्षेत्र एवं रामसर जोन में अब वन्य जीव सुरक्षित नहीं रह गए हैं। जिले में मंडी धनौरा तहसील क्षेत्र से लेकर हसनपुर तहसील क्षेत्र और उससे भी आगे तक वन विभाग की हजारों बीघा भूमि पर अवैध कब्जा अब किसी से छिपा नहीं है। भू-माफिया ने तिगरी, ब्रजघाट से लेकर नरौरा तक गंगा किनारे वन्य जीवों के लिए आरक्षित किए गए आर्द्र भूमि क्षेत्र यानी रामसर जोन को भी नहीं छोड़ा है। राजनीतिक दखल रखने वाले भू-माफिया ने रामसर जोन पर भी अवैध रूप से कब्जा कर रखा है।
क्या है रामसर जोन (वैटलैंड) -
दो फरवरी 1971 को ईरान के रामसर शहर में आयोजित सम्मेलन में विश्व के ऐसे आर्द्र भूमि क्षेत्रों को संरक्षित करने का निर्णय लिया गया जहां विविध प्राणियों के रहने के अनुकूल माहौल हो। इसमें वन्य जीव, घरेलू जीव, जलीय जीव और कीटों के विभिन्न वर्ग एक साथ निवास कर सकते हैं, प्रजनन कर सकते हैं। साथ ही यहां विभिन्न प्रकार के औषधिय पेड़-पौधे भी पाए जाते हैं। रामसर जोन यानी आर्द्र भूमि वाले वे क्षेत्र होते हैं जहां पानी पर्यावरण और इससे जुड़े पौधे और वन्य जीवन को नियंत्रित करने के प्राथमिक कारक होते है। वे वहां पाए जाते हैं जहां पानी का तल जमीन की सतह पर या इसके पास होता है, या जहां की भूमि पानी से भरी होती है। ये पहले कभी पानी या भूमि की ओर परिवर्ती या क्रमिक चरणों में बदलते हुए वास स्थलों के रूप में माने जाते थे, लेकिन अब आर्द्र भूमियों को विशिष्ट पारिस्थितिक विशेषताओं, कार्यों और मूल्यों के साथ अलग पारिस्थितिकी प्रणालियों में माना जाता है। 8 नवंबर 2005 को केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश में ब्रजघाट से नरौरा के बीच 256.9 किलोमीटर क्षेत्र भूमि को रामसर जोन यानी आर्द्र भूमि क्षेत्र घोषित किया। पीपुल फॉर एनिमल रेडिंग सेल से प्रदेश प्रभारी डा. रविंद्र शुक्ला ने बताया उत्तर प्रदेश का यह एक मात्र रामसर जोन है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह भारत का दसवां सबसे बड़ा वैटलैंड क्षेत्र है।
प्रशासन रामसर जोन को सुरक्षित रखने के लिए नही उठा रहा कदम
गजरौला। यह भूमि जलीय और थलीय वन्य जीवों के लिए सुरक्षित मानी गई थी। जिले में भू-माफिया का दबदबा होने के चलते वन विभाग की हजारों बीघा भूमि पर कब्जे के साथ ही रामसर जोन पर भी माफिया का ही राज है। यहां वनों को काटकर गेहूं, गन्ना समेत कई प्रकार की फसलें लहलहा रही हैं। वन्य जीवों के लिए सुरक्षित माना जाने वाला रामसर जोन अब वन्य जीवों के लिए असुरक्षित हो चुका है। वन कटने की वजह से यहां ज्यादातर वन्य जीव शिकारियों का शिकार हो गए। या जो बचे वह यहां से भाग रहे हैं। प्रशासन रामसर जोन को सुरक्षित रखने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहा है।
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ब्रजघाट से लेकर नरोरा तक गंगा के आसपास का क्षेत्रफल रामसर जोन में है। रामसर जोन में खनन नहीं किया जा सकता है। वन विभाग की ओर से खनन के लिए कोई एनओसी नहीं दी गई है। इसके अलावा जो अवैध कब्जे हैं। उन्हें प्रशासन की मदद से छुड़ाया भी गया है और आगे छुड़ाने की कोशिशें लगातार की जा रही हैं।
- रमेशचंद्र, डीएफओ अमरोहा।
गंगा में घट रही डाल्फिन की संख्या
गजरौला। गंगा में लगातार डाल्फिन की संख्या कम हो रही है। उनकी सुरक्षा के लिए प्रशासन या वन विभाग की ओर से कोई सार्थक प्रयास नहीं किए जाते हैं। हालांकि डीएफओ रमेशचंद्र का कहना है कि करीब दो वर्ष पहले गणना कराई गई थी। जिसमें तिगरी एवं ब्रजघाट के बीच करीब सौ से अधिक डाल्फिन पाई गई थीं। बताया कि डाल्फिन की संख्या कम नहीं हुई है। अब उन्हें लोग आसानी से देख सकते हैं। गंगा में घड़ियालों की संख्या भी खूब है। जबकि हस्तिनापुर वन्य क्षेत्र में तेंदुआ, बारहसिंघा, हिरन, जंगली सूअर समेत तमाम वन्य जीव हैं। जिनकी सुरक्षा के लिए समय-समय पर वन विभाग की ओर से काम किए जाते हैं।
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गजरौला (अमरोहा)। वन्य जीवों के लिए सुरक्षित माने जाने वाली हस्तिनापुर वन्य क्षेत्र एवं रामसर जोन में अब वन्य जीव सुरक्षित नहीं रह गए हैं। जिले में मंडी धनौरा तहसील क्षेत्र से लेकर हसनपुर तहसील क्षेत्र और उससे भी आगे तक वन विभाग की हजारों बीघा भूमि पर अवैध कब्जा अब किसी से छिपा नहीं है। भू-माफिया ने तिगरी, ब्रजघाट से लेकर नरौरा तक गंगा किनारे वन्य जीवों के लिए आरक्षित किए गए आर्द्र भूमि क्षेत्र यानी रामसर जोन को भी नहीं छोड़ा है। राजनीतिक दखल रखने वाले भू-माफिया ने रामसर जोन पर भी अवैध रूप से कब्जा कर रखा है।
क्या है रामसर जोन (वैटलैंड) -
दो फरवरी 1971 को ईरान के रामसर शहर में आयोजित सम्मेलन में विश्व के ऐसे आर्द्र भूमि क्षेत्रों को संरक्षित करने का निर्णय लिया गया जहां विविध प्राणियों के रहने के अनुकूल माहौल हो। इसमें वन्य जीव, घरेलू जीव, जलीय जीव और कीटों के विभिन्न वर्ग एक साथ निवास कर सकते हैं, प्रजनन कर सकते हैं। साथ ही यहां विभिन्न प्रकार के औषधिय पेड़-पौधे भी पाए जाते हैं। रामसर जोन यानी आर्द्र भूमि वाले वे क्षेत्र होते हैं जहां पानी पर्यावरण और इससे जुड़े पौधे और वन्य जीवन को नियंत्रित करने के प्राथमिक कारक होते है। वे वहां पाए जाते हैं जहां पानी का तल जमीन की सतह पर या इसके पास होता है, या जहां की भूमि पानी से भरी होती है। ये पहले कभी पानी या भूमि की ओर परिवर्ती या क्रमिक चरणों में बदलते हुए वास स्थलों के रूप में माने जाते थे, लेकिन अब आर्द्र भूमियों को विशिष्ट पारिस्थितिक विशेषताओं, कार्यों और मूल्यों के साथ अलग पारिस्थितिकी प्रणालियों में माना जाता है। 8 नवंबर 2005 को केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश में ब्रजघाट से नरौरा के बीच 256.9 किलोमीटर क्षेत्र भूमि को रामसर जोन यानी आर्द्र भूमि क्षेत्र घोषित किया। पीपुल फॉर एनिमल रेडिंग सेल से प्रदेश प्रभारी डा. रविंद्र शुक्ला ने बताया उत्तर प्रदेश का यह एक मात्र रामसर जोन है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह भारत का दसवां सबसे बड़ा वैटलैंड क्षेत्र है।
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प्रशासन रामसर जोन को सुरक्षित रखने के लिए नही उठा रहा कदम
गजरौला। यह भूमि जलीय और थलीय वन्य जीवों के लिए सुरक्षित मानी गई थी। जिले में भू-माफिया का दबदबा होने के चलते वन विभाग की हजारों बीघा भूमि पर कब्जे के साथ ही रामसर जोन पर भी माफिया का ही राज है। यहां वनों को काटकर गेहूं, गन्ना समेत कई प्रकार की फसलें लहलहा रही हैं। वन्य जीवों के लिए सुरक्षित माना जाने वाला रामसर जोन अब वन्य जीवों के लिए असुरक्षित हो चुका है। वन कटने की वजह से यहां ज्यादातर वन्य जीव शिकारियों का शिकार हो गए। या जो बचे वह यहां से भाग रहे हैं। प्रशासन रामसर जोन को सुरक्षित रखने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहा है।
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ब्रजघाट से लेकर नरोरा तक गंगा के आसपास का क्षेत्रफल रामसर जोन में है। रामसर जोन में खनन नहीं किया जा सकता है। वन विभाग की ओर से खनन के लिए कोई एनओसी नहीं दी गई है। इसके अलावा जो अवैध कब्जे हैं। उन्हें प्रशासन की मदद से छुड़ाया भी गया है और आगे छुड़ाने की कोशिशें लगातार की जा रही हैं।
- रमेशचंद्र, डीएफओ अमरोहा।
गंगा में घट रही डाल्फिन की संख्या
गजरौला। गंगा में लगातार डाल्फिन की संख्या कम हो रही है। उनकी सुरक्षा के लिए प्रशासन या वन विभाग की ओर से कोई सार्थक प्रयास नहीं किए जाते हैं। हालांकि डीएफओ रमेशचंद्र का कहना है कि करीब दो वर्ष पहले गणना कराई गई थी। जिसमें तिगरी एवं ब्रजघाट के बीच करीब सौ से अधिक डाल्फिन पाई गई थीं। बताया कि डाल्फिन की संख्या कम नहीं हुई है। अब उन्हें लोग आसानी से देख सकते हैं। गंगा में घड़ियालों की संख्या भी खूब है। जबकि हस्तिनापुर वन्य क्षेत्र में तेंदुआ, बारहसिंघा, हिरन, जंगली सूअर समेत तमाम वन्य जीव हैं। जिनकी सुरक्षा के लिए समय-समय पर वन विभाग की ओर से काम किए जाते हैं।