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Ambedkar Nagar News: जीवन में सफलता के साथ विनम्रता का संतुलन आवश्यक
Sat, 24 Jan 2026 10:54 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अम्बेडकरनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, अम्बेडकरनगर
Updated Sat, 24 Jan 2026 10:54 PM IST
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बाबा बरुआ दास पीजी कॉलेज परुईया आश्रम में शनिवार को अंतर महाविद्यालयीय खो-खो प्रतियोगिता के दौर
विद्युतनगर।टांडा के श्रीराम जानकी मंदिर जियापुर में श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिन शनिवार को भगवान कृष्ण की रासलीला का वर्णन किया गया। प्रवाचक देव कृष्ण शास्त्री ने बताया कि रास केवल लौकिक प्रेम का प्रसंग नहीं, बल्कि जीव और शिव के मिलन की प्रतीक कथा है।
यह काम को बढ़ाने की नहीं, बल्कि काम पर विजय प्राप्त करने की प्रक्रिया का वर्णन है।कामदेव ने भगवान पर अपने सामर्थ्य के साथ आक्रमण किया, लेकिन भगवान को पराजित नहीं कर सका और अंततः स्वयं परास्त हुआ। कृष्ण का प्रथम विवाह विदर्भ देश के राजा की पुत्री रुक्मणि के साथ हुआ, जिसमें भगवान की ओर से रुक्मणि का हरण कर विवाह संपन्न हुआ। प्रवाचक ने कहा कि यदि जीव अपने धन का उपयोग धर्म और परमार्थ के कार्यों में करता है, तो वह धन सार्थक होता है, अन्यथा धन विभिन्न रूपों में नष्ट हो जाता है। लक्ष्मी और नारायण की उपासना करने वाले व्यक्ति को स्वतः कृपा प्राप्त होती है।जीवन में इच्छाओं पर नियंत्रण ही आत्मविकास का आधार है। जीवन में सफलता के साथ विनम्रता का संतुलन आवश्यक है। रुक्मणि प्रसंग यह संकेत देता है कि धन स्वयं लक्ष्य नहीं, बल्कि साधन है। धन का उपयोग धर्म, सेवा और समाजहित में करने से जीवन में स्थायित्व आता है। केवल संग्रह की प्रवृत्ति अंततः असंतोष को जन्म देती है। मूल्यांकन बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि आंतरिक भाव से होता है। निस्वार्थ कर्म और समर्पण व्यक्ति को जीवन में स्थिरता और उद्देश्य प्रदान करते हैं। इस दौरान धनंजय दास, ओम प्रकाश, यशवंत सिंह, अजय कुमार प्रजापति, शिवकुमार व अन्य उपस्थित रहे।
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यह काम को बढ़ाने की नहीं, बल्कि काम पर विजय प्राप्त करने की प्रक्रिया का वर्णन है।कामदेव ने भगवान पर अपने सामर्थ्य के साथ आक्रमण किया, लेकिन भगवान को पराजित नहीं कर सका और अंततः स्वयं परास्त हुआ। कृष्ण का प्रथम विवाह विदर्भ देश के राजा की पुत्री रुक्मणि के साथ हुआ, जिसमें भगवान की ओर से रुक्मणि का हरण कर विवाह संपन्न हुआ। प्रवाचक ने कहा कि यदि जीव अपने धन का उपयोग धर्म और परमार्थ के कार्यों में करता है, तो वह धन सार्थक होता है, अन्यथा धन विभिन्न रूपों में नष्ट हो जाता है। लक्ष्मी और नारायण की उपासना करने वाले व्यक्ति को स्वतः कृपा प्राप्त होती है।जीवन में इच्छाओं पर नियंत्रण ही आत्मविकास का आधार है। जीवन में सफलता के साथ विनम्रता का संतुलन आवश्यक है। रुक्मणि प्रसंग यह संकेत देता है कि धन स्वयं लक्ष्य नहीं, बल्कि साधन है। धन का उपयोग धर्म, सेवा और समाजहित में करने से जीवन में स्थायित्व आता है। केवल संग्रह की प्रवृत्ति अंततः असंतोष को जन्म देती है। मूल्यांकन बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि आंतरिक भाव से होता है। निस्वार्थ कर्म और समर्पण व्यक्ति को जीवन में स्थिरता और उद्देश्य प्रदान करते हैं। इस दौरान धनंजय दास, ओम प्रकाश, यशवंत सिंह, अजय कुमार प्रजापति, शिवकुमार व अन्य उपस्थित रहे।
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