{"_id":"570be8ca4f1c1b16484a6b2f","slug":"enrollment-only-if-better-education","type":"story","status":"publish","title_hn":"बेहतर हो पढ़ाई, तभी बनेगी एमडीएम व ड्रेस से बात","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बेहतर हो पढ़ाई, तभी बनेगी एमडीएम व ड्रेस से बात
अमर उजाला ब्यूरो/अंबेडकरनगर
Updated Mon, 11 Apr 2016 11:41 PM IST
विज्ञापन
अंबेडकरनगर के ऐसे बदहाल परिषदीय विद्यालयों की तरफ नहीं बढ़ पा रहा अभिभावकों का झुकाव।
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
परिषदीय स्कूलों में नामांकन को लेकर कोई खास उपलब्धि मिल नहीं पा रही है। कारण यह है कि इन स्कूलों में शिक्षा का माहौल बनाने के लिए कोई ठोस प्रयास होता नजर नहीं आता। न तो कक्षावार अध्यापकों की जिम्मेदारी तय करने की सुध है और न ही अध्यापकों की मनमानी पर अंकुश लगाने की कोई कार्ययोजना।
विज्ञापन
नतीजा यह है कि एमडीएम से लेकर स्कूल चलो अभियान रैली तक सब कुछ सिर्फ फर्ज अदायगी के तहत निपटाया जा रहा है। पाल्यों की शिक्षा को लेकर गंभीर हो रहे लोग इन्हीं सब के चलते अपने बच्चों का नामांकन इन स्कूलों में कराने की बजाए गांव या पास-पड़ोस में खुले नर्सरी स्कूलों में कराने को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं।
विज्ञापन
नामांकन को लेकर बेसिक शिक्षा महकमा कितना गंभीर है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब तक हुए नामांकन का कोई औसत रिकार्ड भी जिला मुख्यालय पर उपलब्ध नहीं है।
विज्ञापन
परिषदीय स्कूलों की दशा व दिशा सुधारने के लिए यूं तो सरकार तमाम प्रकार के प्रबंध कर रही है लेकिन उसका कोई खास लाभ मिलता दिख नहीं रहा है। आमतौर पर स्कूलों में नामांकन को लेकर लोगों में कोई उत्साह नजर नहीं आ रहा है।
हालांकि शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल चलो अभियान रैली जरूर कई जगह पूरी तत्परता के साथ निकाली जाती दिखी लेकिन ज्यादातर स्कूलों में मामला सिर्फ फर्ज अदायगी तक ही रह गया। अभियान के पहले तय हुआ था कि गांव-गांव में पंचायत स्तरीय जनप्रतिनिधियों की भागीदारी तय की जाएगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो सका।
नामांकन को लेकर पूरी तरह से सन्नाटा ही पसरा हुआ है। न तो शहरी क्षेत्र के परिषदीय स्कूलों में नामांकन को लेकर अभिभावकों में कोई जोश दिख रहा है और न ही ग्रामीण क्षेत्रों में। एक बड़ा कारण जिले में स्थानांतरण के चलते बीएसए की गैर मौजूदगी भी है।
अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मुख्यालय पर विभाग के पास यह आंकड़ा ही नहीं है कि कितने नामांकन अब तक हुए हैं। गत वर्ष के औसत नामांकन का डाटा उपलब्ध करा पाना तो दूर की बात थी।