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यतींद्रानंद गिरि बोले : अखांडों ने महामंडलेश्वर पद को बनाया मजाक का विषय, बनाईजाए आचार नियमावली

Sat, 01 Feb 2025 11:47 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, महाकुंभ नगर (प्रयागराज)
अमर उजाला नेटवर्क, महाकुंभ नगर (प्रयागराज) Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 01 Feb 2025 11:47 AM IST
सार

महामंडलेश्वर शंकराचार्य के समतुल्य सम्मान और आदर का पद है। इसकी गरिमा बनी रहनी चाहिए। संन्यास लेने के बाद जब कोई अपने संन्यास की श्रेष्ठता को समाज में सिद्ध करता है, तब जाकर अखाड़े उसको महामंडलेश्वर के पद से सम्मानित करते हैं।

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Yatindranand Giri said: Akhands made the post of Mahamandaleshwar a subject of joke
स्वामी यतींद्रानंद। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

बालीवुड अभिनेत्री ममता कुलकर्णी को किन्नर अखाड़ा द्वारा महामंडलेश्वर बनाए जाने का चौतरफा विरोध हो रहा है। इससे संत समाज भी खासा नाराज है। जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर यतींद्रानंद गिरि ने कहा कि अखाड़ों ने महामंडलेश्वर पद को मजाक का विषय बना दिया है।

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उन्होंने कहा कि शास्त्रों में उल्लेख है कि जिसको महामंडलेश्वर बनना है, वह 12 वर्ष तक कठोर अनुशासन में रहकर ब्रह्मचारी रहे। उसके बाद वह निर्णय ले कि मैं संन्यास ग्रहण करूंगा। महामंडलेश्वर तो बहुत बड़ी बात है। आज अखाड़ों ने महामंडलेश्वर को मजाक का विषय बना दिया है, जो नहीं बनना चाहिए।

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महामंडलेश्वर शंकराचार्य के समतुल्य सम्मान और आदर का पद है। इसकी गरिमा बनी रहनी चाहिए। संन्यास लेने के बाद जब कोई अपने संन्यास की श्रेष्ठता को समाज में सिद्ध करता है, तब जाकर अखाड़े उसको महामंडलेश्वर के पद से सम्मानित करते हैं। जो प्रतिष्ठित और अधिकृत 13 अखाड़े हैं, उनमें से किसी ने भी उन्हें संन्यासी या महामंडलेश्वर नहीं बनाया। किन्नर अखाड़ा जैसे अनेक अखाड़े हैं, जिनको न तो साधु समाज अधिकृत मानता है या मान्यता देता है और न ही प्रशासन उनको मान्यता देता है।

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अग्नि अखाड़े में नहीं है संन्यास का प्रावधान

संन्यासियों के केवल छह अखाड़े महामंडलेश्वर बना सकते हैं। इनमें से तीन अखाड़े जूना, निरंजनी, महानिर्वाणी हैं। इसके अलावा तीन अखाड़े अटल, आनंद, आवाहन हैं, जो पहले तीन अखाड़ों की सहमति से अपने यहां महामंडलेश्वर बना सकते हैं।

संन्यासियों का सातवां अखाड़ा अग्नि अखाड़ा है। अग्नि अखाड़े में संन्यास का प्रावधान नहीं है, वहां सब ब्रह्मचारी होते हैं। यदि उनको संन्यास लेना होता है तो इन छह अखाड़ों में से चयन करते हैं। यही छह अखाड़े महामंडलेश्वर बनाने के लिए हैं।

उदासीन, निर्मल, वैष्णव वैराग्यों में महामंडलेश्वर की परंपरा महापुरुषों ने नहीं रखी है। वहां पर महंत और श्रीमहंत होते हैं। द्वाराचार्य व अन्य पद होते हैं। यहां पर बहुत महंत, श्रीमहंत लोग भी महामंडलेश्वर लिखकर घूम रहे हैं। बाकी और कोई महामंडलेश्वर बना रहा है या बना हुआ है, वह सब फर्जी हैं। आज आवश्यकता यह है कि अखाड़े आगे आएं और आचार नियमावली बनाएं कि कौन महामंडलेश्वर बना सकता है।

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