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Akshay Vat : जब अक्षयवट दर्शन के लिए अंग्रेजों ने लगाए थे टिकट, श्रद्धालुओं के विरोध पर वापस लिया था फैसला

Fri, 14 Feb 2025 01:51 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, महाकुंभ नगर (प्रयागराज)
अमर उजाला नेटवर्क, महाकुंभ नगर (प्रयागराज) Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 14 Feb 2025 01:51 PM IST
सार

सवा सौ साल पहले अंग्रेजों ने अक्षयवट देखने के लिए टिकट लगा रखा था। यह टिकट भी अंग्रेज सिपाही वितरित करते थे, लेकिन इस पर एतराज जताते हुए श्रद्धालु भड़क उठे थे।

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When the British had imposed tickets for Akshay Vat darshan, the decision was withdrawn due to the protest of
अक्षय वट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

सवा सौ साल पहले अंग्रेजों ने अक्षयवट देखने के लिए टिकट लगा रखा था। यह टिकट भी अंग्रेज सिपाही वितरित करते थे, लेकिन इस पर एतराज जताते हुए श्रद्धालु भड़क उठे थे। उनका कहना था टिकट लेने के दौरान अंग्रेज सिपाहियों के छूने से वह अपवित्र हो जाते हैं। ऐसे में उनको दर्शन का फल नहीं मिलेगा। इसके बाद आखिरकार अंग्रेजी हुकूमत को फैसला वापस लेना पड़ा।सेक्टर सात स्थित संस्कृति विभाग केे पंडाल में कुंभ आयोजन से जुड़े तमाम पुराने दस्तावेज प्रदर्शित किए गए हैं।

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इनके जरिये कुंभ आयोजन से जुड़े कई रोचक तथ्य भी सामने आए हैं। दस्तावेज बताता है कि वर्ष 1906 में आयोजित कुंभ के दौरान अक्षयवट को दर्शनार्थियों के लिए खोला गया। सुरक्षा के लिए सरकार ने वहां अंग्रेज सिपाहियों की एक टुकड़ी तैनात कर दी। टुकड़ी के सिपाहियों को ही टिकट बेचने का जिम्मा दिया। टिकट खरीदने वाले श्रद्धालु सरकार के इस फैसले पर भड़क उठे।
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ब्रिटिश काल के दस्तावेज बताते हैं कि उस दाैरान श्रद्धालुओं ने यह कहते हुए विरोध जताया कि अंग्रेज सिपाहियों से स्पर्श होने से वह अपवित्र हो जाते हैं। ऐसे में उनकी धार्मिक यात्रा खंडित हो जाती है। उनके इस विरोध को इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों ने भी प्रकाशित किया। विरोध को देखते हुए सरकार को वह टुकड़ी वहां से हटानी पड़ी।

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साधुओं के लिए 9500 रुपये की लागत से बनाया था नावों से बना पुल

कुंभ के दौरान व्यवस्था बनाना हमेशा से प्रशासनिक अफसरों के लिए गंभीर चुनौती रही है। यहां प्रदर्शित एक दस्तावेज से वर्ष 1894 कुंभ के दौरान पेश आने वाली दिक्कतों का पता चलता है। तत्कालीन ज्वाइंट मजिस्ट्रेट एवं प्रभारी एचडब्ल्यू पाइक की ओर से बनाए गए कार्यादेश में बताया गया है कि इस वर्ष गंगा की धारा झूंसी से बदलकर किले की तरफ हो गई है। इस वजह से साधुओं को संगम तक पहुंचाने के लिए नावों का पुल तैयार कराया गया। इस पुल की लागत 9500 आंकी गई। गंगा का प्रवाह बदलने से मेला प्रशासन को कुल 15700 रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ गए।

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