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अनिल यादव के खिलाफ गणमान्य नागरिकों ने भी खोला मोर्चा
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Mon, 14 Sep 2015 11:50 PM IST
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लोक सेवा आयोग अध्यक्ष डॉ. अनिल यादव की नियुक्ति के खिलाफ अब सिर्फ प्रतियोगी परीक्षा दे रहे छात्र ही नहीं ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने समाज में एक मुकाम हासिल किया है। पूर्व आईएएस, आईपीएस अधिकारी, पूर्व कुलपति भी नियुक्ति के खिलाफ कोर्ट पहुंच चुके हैं। सोमवार को इन गणमान्य नागरिकों ने याचिका के जरिए अदालत के समक्ष कुछ ऐसे सवाल उठाए हैं जिससे जाहिर होता है कि मौजूद आयोग अध्यक्ष के मामले में सरकार की जिद शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक बनाने जैसी है।
यानी अपनी पसंद का काम करने के लिए सारे नियम-कायदे ताक पर। कम से कम याचिका में लगाए गए आरोपों तो यही कहा गया है। एक ऐसा पद जिस पर बैठने वाले व्यक्ति से उच्च स्तर की नैतिकता, कार्यों में शुचिता, अपने क्षेत्र में विशेष उपलब्धता, ख्यातिलब्धता, निष्पक्षता और बेदाग चारित्र की अपेक्षा की जाती है, सरकार ने इस पद पर डॉ. अनिल यादव को चुना जिनके खिलाफ पद की गारिमा के खिलाफ काम करने, भर्तियों में पक्षपात करने तथा नियमों को ताक पर रखकर एक जाति विशेष को ही लाभ पहुंचाने के तमाम आरोप हैं। सबसे बड़ा प्रश्न चिन्ह तो यही है कि सरकार ने अनिल यादव की नियुक्ति करने के लिए उनके खिलाफ दर्ज तमाम आपराधिक मुकदमों को भी नजरअंदाज कर दिया।
गणमान्य नागरिकों की याचिका में ऐसे कई तर्क दिए गए हैं जो न सिर्फ आयोग अध्यक्ष की चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हैं बल्कि अध्यक्ष के रूप में किए गए उनके कार्यों पर भी प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। उनके कार्यकाल के दौरान हुई नियुक्तियों की भी जांच सीबीआई से कराने की मांग की गई है। अनिल यादव के खिलाफ इस नए मामले की सुनवाई पहले से दाखिल याचिका के साथ 22 सितंबर को होनी है। सुनवाई मुख्य न्यायमूर्ति डॉ. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की पीठ करेगी। सीबीआई जांच का फैसला अदालत को ही तय करना है।
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याचिका दाखिल करने वालों में पंजाब के पूर्व डीजीपी जूलियो एफ रिबेरो, भारत सरकार के पूर्व सचिव एसएटी रिजवी, पूर्व डीजीपी आईसी चतुर्वेदी, पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह, पूर्व प्रमुख सचिव एसएन शुक्ला, पूर्व कुलपति एचसी पांडेय, पूर्व एडीजीपी एसएन सिंह और अरुणेश कुमार मिश्र शामिल हैं।
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यानी अपनी पसंद का काम करने के लिए सारे नियम-कायदे ताक पर। कम से कम याचिका में लगाए गए आरोपों तो यही कहा गया है। एक ऐसा पद जिस पर बैठने वाले व्यक्ति से उच्च स्तर की नैतिकता, कार्यों में शुचिता, अपने क्षेत्र में विशेष उपलब्धता, ख्यातिलब्धता, निष्पक्षता और बेदाग चारित्र की अपेक्षा की जाती है, सरकार ने इस पद पर डॉ. अनिल यादव को चुना जिनके खिलाफ पद की गारिमा के खिलाफ काम करने, भर्तियों में पक्षपात करने तथा नियमों को ताक पर रखकर एक जाति विशेष को ही लाभ पहुंचाने के तमाम आरोप हैं। सबसे बड़ा प्रश्न चिन्ह तो यही है कि सरकार ने अनिल यादव की नियुक्ति करने के लिए उनके खिलाफ दर्ज तमाम आपराधिक मुकदमों को भी नजरअंदाज कर दिया।
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गणमान्य नागरिकों की याचिका में ऐसे कई तर्क दिए गए हैं जो न सिर्फ आयोग अध्यक्ष की चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हैं बल्कि अध्यक्ष के रूप में किए गए उनके कार्यों पर भी प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। उनके कार्यकाल के दौरान हुई नियुक्तियों की भी जांच सीबीआई से कराने की मांग की गई है। अनिल यादव के खिलाफ इस नए मामले की सुनवाई पहले से दाखिल याचिका के साथ 22 सितंबर को होनी है। सुनवाई मुख्य न्यायमूर्ति डॉ. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की पीठ करेगी। सीबीआई जांच का फैसला अदालत को ही तय करना है।
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याचिका दाखिल करने वालों में पंजाब के पूर्व डीजीपी जूलियो एफ रिबेरो, भारत सरकार के पूर्व सचिव एसएटी रिजवी, पूर्व डीजीपी आईसी चतुर्वेदी, पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह, पूर्व प्रमुख सचिव एसएन शुक्ला, पूर्व कुलपति एचसी पांडेय, पूर्व एडीजीपी एसएन सिंह और अरुणेश कुमार मिश्र शामिल हैं।