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दरकने की कगार पर टोडरमल का मोती महल

Sun, 03 Jun 2018 01:16 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sun, 03 Jun 2018 01:16 AM IST
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Totaramal's Moti Mahal on the verge of decree
इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अगले साल आयोजित होने वाले कुंभ की तैयारियां तो जोरों पर हैं, लेकिन शहर की ऐतिहासिक धरोहरों को संवारने की अभी तक प्रशासन ने पहल नहीं की है। गंगा तट पर स्थित राजा टोडरमल का किला मोती महल देखरेख के अभाव में खंडहर में तब्दील हो गया है। कुंभ के दौरान देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु इस किले को भी देखने आएंगे, लेकिन प्रशासन ने इसकी सुधि लेना अब तक मुनासिब न समझा है।
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संगम तट पर अकबर के किले के निर्माण के दौरान कैंप करने के लिए टोडरमल ने मोती महल का निर्माण कराया था, जोकि वर्तमान में टोडरमल की 17वीं पीढ़ी के वंशजों के स्वामित्व में है। किले के छह में से पांच फाटक टूट चुके हैं। 12 जून 1857 को ब्रिटिश हुकूमत के अंतिम गवर्नर जनरल कर्नल नील ने इस किले पर हमला किया था। तब तोप के गोले दागकर पूरी गारद तो मारी ही गई, पांचों पाटक तोड़ डाले गए थे। तब से इस किले में दोबारा फाटक नहीं लगे।
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किले के एक हिस्से में रहने वाले टोडरमल के वंशज अरुण कुमार अग्रवाल के मुताबिक ब्रितानी सेना के हमले में नौ हजार से अधिक लोग इलाहाबाद में मारे थे। सन् 1585 में टोडरमल ने मोती महल की नींव डाली और 1590 में इसका निर्माण पूरा हुआ। 40 हजार स्क्वायर फीट एरिया में बने इस किले में नक्काशीदार पायों वाला आलीशान दरबार हाल, दीवान-ए-खास, दीवान-ए-आम के अलावा सैनिकों के घोड़े बांधने के लिए अस्तबल आज भी सलामत है, लेकिन रखरखाव न होने की वजह से किले में वीरानी छाई रहती है। चारो तरफ कूड़े के ढेर और बिखरा कचरा किले की सूरत बिगाड़ रहा है। उत्तर -पश्चिम कोने पर द्वितीय तल में दीवानखाना और पश्चिनी कोने पर राजा टोडरमल का कक्ष अभी भी देखा जा सकता है।
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इस मोती महल में टोडरमल का सचिवालय चलता था। प्रथम खंड पर शस्त्रागार और मंत्री, सिपहसालार रहते थे। इन तीनों खंडों को तोप से उड़ाकर ब्रिटिश सेना ने लूट लिया था। उसके बाद से ही नीचे के तीन खंड बंद रहते हैं। अरुण कुमार के पुत्र सुधांशु अग्रवाल बताते हैं कि संसाधन नहीं है कि नीचे के तलों को खोलवाया जा सके। नीचे के हिस्से में उस दौर की कई अनूठी निशानियां दबी पड़ी हैं। मदद के लिए कई बार पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन से गुहार लगाई गई लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। टोडरमल के वंशज चाहते हैं कि यह उनकी अंतिम निशानी है, इसलिए इसका जीर्णोद्धार और संरक्षण भी उनकी ही देखरेख में हो।
वंशजों के अनुसार मोती महल का इतिहास

-1745 में अवध के नवाब शाह शुजाउद्दौला ने आक्रमण कर मोती महल को छीन लिया
-1746 में लार्ड क्लाइव ने शुजाउद्दौला को हराकर मोती महल को टोडरमल के वंशजों को वापस कराया
-1785 में वारेन हेस्टिंग्ज ने फिर आक्रमण कर मोती महल को ले लिया
-1857 में कर्नल नील के नेतृत्व में तोप से किले के कई हिस्से को उड़ा दिया गया और शस्त्रागार खजाना लूट लिया गया

-टोडरमल 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में झूंसी स्थित प्रतिष्ठानपुरी के राजा थे। पहली बार शेरशाह सूरी ने टोडरमल को अपना राजस्व मंत्री नियुक्त किया था और खजाना भरने की जिम्मेदारी दी थी।
-1560 में बैरम खां से परेशान होकर अकबर ने इलाहाबाद में जब पड़ाव डाला था तब वह टोडरमल से प्रभावित हुआ और अपने साथ आगरा ले गया। वहां उसने टोडरमल को राजस्व मंत्री और आंतरिक सुरक्षा मंत्री की जिम्मेदारी दी थी।

- टोडर मल ने ही पहली बार भूमि माप की इकाई गज का आविष्कार किया।
कोट
बार-बार हुए हमले और छीनाझपटी के बाद यह किला हमें वापस मिला है। अब हम इसे गंवाना नहीं चाहते। सरकार अगर संरक्षण के लिए कदम उठाती है तो स्वागत करेंगे, लेकिन इसे हस्तांतरित नहीं कर सकते।
 अरुण कुमार अग्रवाल, टोडरमल के वंशज।
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