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अनुकंपा नियुक्ति के मामले में हाईकोर्ट का अहम फैसला, नियुक्त विधवा के पुनर्विवाह पर रोक नहीं
Sat, 08 Feb 2020 02:10 PM IST
इलाहाबाद ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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Published by: इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Sat, 08 Feb 2020 02:10 PM IST
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हाईकोर्ट ने कहा है कि मृतक आश्रित कोटे में नियुक्त विधवा के पुनर्विवाह करने पर कोई रोक नहीं है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मर्जी से विवाह या पुनर्विवाह करने का अधिकार है। उसके इस मौलिक अधिकार में कटौती नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि मृतक आश्रित सेवा नियमावली में यह शर्त है कि जो भी आश्रित के रूप में नियुक्त होगा, वह मृतक के आश्रितों का भरण-पोषण करेगा। यदि आश्रितों का भरण-पोषण नहीं करता तो उसे नौकरी से हटाया जा सकता है। इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता की आश्रित के रूप में नियुक्त व्यक्ति यदि विवाह करता है तो उसे सेवा से हटा दिया जाएगा। किसी को भी पुनर्विवाह करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने याची को इस शर्त के साथ अपने देवर के साथ पुनर्विवाह करने की पूरी छूट दी है कि वह हर महीने अपने वेतन का एक तिहाई अपनी सास को भुगतान करती रहेगी। यह आदेश न्यायमूर्ति एसपी केशरवानी ने संतोषी की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। याची के पति चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे। सेवाकाल में उनकी मृत्यु के बाद याची की मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति मिली। उसने विभाग में अर्जी दी कि वह अपने देवर के साथ शादी करना चाहती है और अपनी सास का पालन पोषण भी करती रहेगी तथा एक तिहाई वेतन उनको देने के लिए तैयार है। विभाग ने उसकी अर्जी को नामंजूर कर दी और कहा कि वह मृतक आश्रित सेवा नियमावली के तहत नियुक्त हुई है, इसलिए पुनर्विवाह नहीं कर सकती।
इसके खिलाफ याचिका दाखिल की गई थी। कोर्ट ने कहा कि नियमावली के अंतर्गत केवल भरण-पोषण न करने पर सेवाएं समाप्त की जा सकती हैं। लेकिन, इसमें पुनर्विवाह करने पर सेवा समाप्त होने की शर्त नहीं है। संविधान प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मर्जी से जीवन जीने का अधिकार देता है और वह अपनी मर्जी से शादी कर सकता है, जिस पर किसी भी कानून के तहत रोक नहीं लगाई जा सकती। कोर्ट ने याची को अपने देवर के साथ शादी कर अपने परिवार के भरण-पोषण करने की छूट दी है।
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कोर्ट ने याची को इस शर्त के साथ अपने देवर के साथ पुनर्विवाह करने की पूरी छूट दी है कि वह हर महीने अपने वेतन का एक तिहाई अपनी सास को भुगतान करती रहेगी। यह आदेश न्यायमूर्ति एसपी केशरवानी ने संतोषी की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। याची के पति चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे। सेवाकाल में उनकी मृत्यु के बाद याची की मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति मिली। उसने विभाग में अर्जी दी कि वह अपने देवर के साथ शादी करना चाहती है और अपनी सास का पालन पोषण भी करती रहेगी तथा एक तिहाई वेतन उनको देने के लिए तैयार है। विभाग ने उसकी अर्जी को नामंजूर कर दी और कहा कि वह मृतक आश्रित सेवा नियमावली के तहत नियुक्त हुई है, इसलिए पुनर्विवाह नहीं कर सकती।
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इसके खिलाफ याचिका दाखिल की गई थी। कोर्ट ने कहा कि नियमावली के अंतर्गत केवल भरण-पोषण न करने पर सेवाएं समाप्त की जा सकती हैं। लेकिन, इसमें पुनर्विवाह करने पर सेवा समाप्त होने की शर्त नहीं है। संविधान प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मर्जी से जीवन जीने का अधिकार देता है और वह अपनी मर्जी से शादी कर सकता है, जिस पर किसी भी कानून के तहत रोक नहीं लगाई जा सकती। कोर्ट ने याची को अपने देवर के साथ शादी कर अपने परिवार के भरण-पोषण करने की छूट दी है।
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