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जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि पर विशेष : उनकी अस्थियां उस धरती पर छितरा दी गईं, जहां भारत के किसान काम करते थे
Wed, 28 May 2025 12:56 PM IST
विनोद सिंह
देवेंद्र यादव, प्रयागराज
देवेंद्र यादव, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Wed, 28 May 2025 12:56 PM IST
सार
वह आदमी जो कभी जवाहरलाल नेहरू था अब मुट्ठीभर राख में बदल चुका था। ये शब्द वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने एक एजेंसी के लिए नेहरू के शोक समाचार पर लिखे थे।
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पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू। jawaharlal nehru
- फोटो : X/@INCIndia
विस्तार
वह आदमी जो कभी जवाहरलाल नेहरू था अब मुट्ठीभर राख में बदल चुका था। ये शब्द वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने एक एजेंसी के लिए नेहरू के शोक समाचार पर लिखे थे। नेहरू का जन्म साल 1889 को इलाहाबाद (प्रयागराज) में हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो से और कॉलेज की शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज (लंदन) से पूरी की थी। बाद में लॉ की डिग्री कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पूरी की। 1912 में वह भारत लौटे और वकालत की शुरुआत की। उन दिनों आजादी का संघर्ष चल रहा था। इस संघर्ष में वह 1917 में होमरूल लीग के जरिये शामिल हुए।
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राजनीति का ककहरा उन्होंने दो साल बाद 1919 में महात्मा गांधी के संपर्क में आकर सीखना शुरू किया। बाद में नेहरू इतने माहिर हो गए कि भारत माता का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखते हैं। इस विशाल भूमि में फैले भारतवासी सबसे ज्यादा मायने रखते हैं। भारत माता यही करोड़ों-करोड़ जनता है और भारत माता की जय उसकी भूमि पर रहने वाले इन सबकी जय है।
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वह भारत के प्रधानमंत्री कैसे बने इस पर इतिहासकार रामचंद्र गुहा कहते हैं कि वह एक ऐसे हिंदू थे जो मुसलमानों के साथ दोस्ताना व्यवहार रखते थे। एक ऐसे ब्राह्मण थे जो जातियों के बंधन को नहीं मानते थे। एक ऐसे उत्तर भारतीय थे जो दक्षिण पर हिंदी नहीं थोपते थे। एक ऐसे शख्स थे जिसकी वैज्ञानिक सोच पर लोग भरोसा करते थे ...इस तरह गांधी के बाद नेहरू ही सबसे विशाल हृदय भारतीय थे।
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प्रधानमंत्री बनने के बाद नेहरू ने भारत को एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी राष्ट्र के रूप में स्थापित किया और देश के विकास के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया। लेकिन, हर मनुष्य जो महान होने का भी गौरव प्राप्त कर चुका है। उसका भी अंतिम सत्य मृत्यु है। नेहरू की छोटी बहन विजयलक्ष्मी पंडित अपनी आत्मकथा द स्कोप ऑफ हैपीनेस लिखती हैं, जब मैंने भाई को देखा तो उनका चेहरा सुंदर और निर्मल दिखाई दे रहा था।
बुद्ध के लिए उनके मन में हमेशा से खास भावनाएं थीं। वह कहते थे कि मेरे मरने का सबसे अच्छा दिन बुद्ध जयंती होगी। बुद्ध जयंती के दिन ही भाई हमें छोड़ कर गए थे। इस तरह 27 मई 1964 के दिन नेहरू का देहांत हुआ। तेरह दिन बाद अंतिम संस्कार के लिए उनकी अस्थियों को एक विशेष ट्रेन से संगम में प्रवाहित करने के लिए इलाहाबाद लाया गया। उनको अंतिम विदाई देने इलाहाबाद स्टेशन पर दलाई लामा भी पहुंचे हुए थे।
करीब तीस साल पहले नेहरू पत्नी कमला की अस्थियों को स्विटजरलैंड से लाए थे। पत्नी की अस्थियां नेहरू चाहे आनंद भवन, जेल, दिल्ली में यॉर्क रोड वाले घर में या जहां भी हों उनकी पलंग के सिरहाने रखी रहती थीं । नेहरू की अस्थियों के अलावा उनकी पत्नी कमला नेहरू की भी अस्थियां एक साथ प्रवाहित की गईं।
नेहरू ने अपनी वसीयत में लिखा था मरने के बाद उनकी अस्थियों को हवाई जहाज से भारत के हर राज्य में गिरा दिया जाए। इसका पालन करते हुए इंदिरा गांधी श्रीनगर से विमान पर चढ़ीं और वायुसेना के अधिकारी केएन शास्त्री की मदद से उन्होंने उस धरती पर अस्थियां बिखेर दीं, जहां नेहरू के पूर्वजों का जन्म हुआ था और जिससे नेहरू बहुत प्यार करते थे।
बाकी बची अस्थियों को भारतीय वायुसेना के विमानों ने सभी राज्यों की उस धरती पर छितरा दिया जहां भारत के किसान काम करते थे। जहां भारत के करोड़ों-करोड़ लोग रहते थे, जिसे नेहरू वास्तव में भारत माता मानते थे।