प्रयागराज : आजादी के आंदोलन में अब्दुल मजीद, ननकाजी और द्वारिका प्रसाद का रहा विशेष योगदान
यहां बात हो रही है प्रयागराज के अब्दुल मजीद, ननका व द्वारिका प्रसाद की। यह तीनों ही क्रांतिकारी यहां 1942 में अंग्रेजों की गोली का शिकार हुए। इसमें ननका उस समय शहीद हुए जब उन्होंने शहर कोतवाली पर तिरंगा फहरा दिया। ननका के तिरंगा फहराने के बाद अंग्रेजों ने उन्हें गोली मार दी। खास बात यह है कि तीनों ही क्रांतिकारी एक-एक दिन के अंतराल पर 12 से 14 अगस्त के बीच शहीद हुए।
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देश की आजादी में जितना योगदान अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह आदि का रहा, उतना ही उन गुमनाम शहीदों का भी रहा। लेकिन, उनकी शहादत को यथोचित सम्मान और पहचान नहीं पायी, जिसके वह हकदार थे। यहां बात हो रही है प्रयागराज के अब्दुल मजीद, ननका व द्वारिका प्रसाद की। यह तीनों ही क्रांतिकारी यहां 1942 में अंग्रेजों की गोली का शिकार हुए। इसमें ननका उस समय शहीद हुए जब उन्होंने शहर कोतवाली पर तिरंगा फहरा दिया। ननका के तिरंगा फहराने के बाद अंग्रेजों ने उन्हें गोली मार दी। खास बात यह है कि तीनों ही क्रांतिकारी एक-एक दिन के अंतराल पर 12 से 14 अगस्त के बीच शहीद हुए।
अब शहीद ननकाजी का ही उदाहरण लें। अगस्त क्रांति आंदोलन के दौरान आजादी पाने का जुनून हर वर्ग पर था। 12 अगस्त 1942 को ननकाजी चौक में कोतवाली में चोरी छिपे तिरंगा लेकर पहुंच गए। सिपाहियों से घिरी कोतवाली में वह चुपचाप ऊपर चढ़ गए। वहां उन्होंने तिरंगा फहरा दिया। यह देख अंग्रेजों ने उन्हें गोली मार दी। हालांकि, अंग्रेजों ने अपने दस्तावेज में सुविधानुसार लिखा कि तिरंगा फहराने के प्रयास में वह मारे गए। इसी के ठीक एक दिन बाद यानी कि 13 अगस्त 1942 को अगस्त क्रांति आंदोलन के तहत अंग्रेजों के खिलाफ जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे थे।
कोतवाली पर झंडा फहराने के बाद अंग्रेजों ने मार दी थी गोली
अंग्रेजों की क्रूरता से लोग डरे नहीं इसे लेकर अब्दुल मजीद ने एक मिसाल पेश की। अब्दुल मजीद राइन के सगे भतीजे एवं कारोबारी मो.कादिर बताते हैं कि तब 18 वर्ष के अब्दुल मजीद राइन तिरंगा लेकर सत्याग्रहियों की टोली में अंग्रेजों के सामने खड़े हो गए। तब पुलिस ने सभी को वहां से हटने का निर्देश दिया, लेकिन राइन वहां से नहीं हटे और अंग्रेजों ने उन्हें गोली मार दी। उस दौरान प्रयागराज में अंग्रेजों ने कई लोगों को गोली मारी थी।
इसके बाद 14 अगस्त 1942 को तकरीबन पूरा इलाहाबाद अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खड़ा होकर सड़कों पर उतर आया। शहर का मध्य भाग आंदोलनकारियों का केंद्र था। चौक, घंटाघर, हीवेट रोड, जानसेनगंज, नखास कोना आदि क्षेत्र से छोटे-छोटे जुलूस की शहर में सत्याग्रह करने वाले लोग शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे थे। इसी बीच हीवेट रोड निवासी 22 वर्षीय द्वारिका प्रसाद को अंग्रेजों ने गोलियों से भून दिया।
द्वारिका प्रसाद जैसे सत्याग्रही किसी भी धमकी में नहीं आ रहे थे। अंग्रेज हर हाल में आंदोलन कुचलने में अमादा थे, इसी वजह से अंग्रेजों ने द्वारिका प्रसाद को गोली मार दी। प्रयागराज के यह तीनों शहीद आजादी मिलने के बाद कई वर्ष तक गुमनाम रहे। हालांकि,इनकी गौरव गाथा पिछले वर्ष ही प्रयागराज जंक्शन के मुख्य हॉल में फोटो सहित दर्शाई गई है, ताकि नई पीढ़ी अपने इन गुमनाम शहीदों को याद कर सके।