शोध : मानव शरीर पर दिखने लगे माइक्रो प्लास्टिक के गंभीर दुष्परिणाम, डॉ. अजय ने अपने शोध में जताया था अंदेशा
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इन सूक्ष्म कणों के प्रसार और स्वास्थ्य पर उनके गंभीर दुष्परिणाम को लेकर चिंताएं अचानक बढ़ गई हैं। डॉ. अजय कुमार सोनकर के अनुसार हाल ही में प्रकाशित अध्ययन में न्यू मैक्सिको विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा मानव अंडकोष में माइक्रोप्लास्टिक पाए जाने के लगभग एक महीने बाद यह नया मामला प्रकाश में आया है। 19 जून को योर सेक्सुअल मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि इरेक्टाइल डिसफंक्शन (ईडी) के इलाज के लिए सर्जरी करवाने वाले छह पुरुषों के लिंग के ऊतकों में सात अलग-अलग प्रकार के माइक्रोप्लास्टिक पाए गए हैं।
गहन अध्ययन से सूक्ष्ण कणों का पता चला
मियामी विश्वविद्यालय, कोलोराडो विश्वविद्यालय और जर्मनी में शोध संस्थान हेल्महोल्ट्ज-जेंट्रम हियरॉन के वैज्ञानिकों ने पाया है कि सात विभिन्न प्रकार के माइक्रोप्लास्टिक्स में से पॉलीइथिलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी) (47.8 प्रतिशत) और पॉली प्रोपाइलीन (पीपी) (34.7 प्रतिशत) सबसे अधिक मात्रा में थे। छह व्यक्तियों से एकत्र किए गए लिंग ऊतक के नमूनों का विश्लेषण लेजर डायरेक्ट इंफ्रारेड माइक्रो स्पेक्ट्रोस्कोपी नामक तकनीक के उपयोग से किया गया था।
अंडमान में अपने वैज्ञानिक शोधकार्य में लगे डाॅ. अजय ने 2019 में प्रयागराज में टिस्यू कल्चर की एक आधुनिक प्रयोगशाला स्थापित करके कोशिकीय जीव विज्ञान पर शोध की शुरुआत की थी। अपने प्रयोगों के दौरान अंडमान के समुद्री सीप से लाए गए मेंटल टिस्यू में अचानक एक दिन माइक्रान साइज के कुछ अज्ञात कण दिखाई दिए, जिनकी आकृति अप्राकृतिक ज्यामितीय की थी। गहन अध्ययन से पता चला कि ये प्लास्टिक के सूक्ष्म कण थे।
समुद्र, नदी, तालाब सभी जल में सूक्ष्म कण
डाॅ. अजय ने बताया कि इस घटना ने उन्हें गहन चिंता में डाल दिया, क्योंकि टिस्यू में कुछ भी खून से ही पहुंच सकता है और खून में भोजन से। सीप का मुख्य भोजन समुद्री शैवाल होता है जो भोजन शृंखला का प्रथम पायदान है। अब प्रश्न ये था कि क्या माइक्रो प्लास्टिक हमारी भोजन शृंखला में प्रवेश कर गया है? इसके बाद समुद्र, नदी, तालाब, बोरवेल सहित तमाम जल स्रोतों से इकट्ठा किए गए नमूनों की जांच में पता चला कि हर जल में प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों की मौजूदगी थी।
तब से लगातार डाॅ. अजय तमाम अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्र पत्रिकाओं के साथ अपने शोध को साझा करते आ रहे हैं। जिनमें इन्होंने बताया कि किस प्रकार मानव सहित अन्य जीवों और वनस्पतियों में माइक्रोप्लास्टिक पहुंच रहा है। हमारे सांस लेने वाली वायु, पीने वाले जल और हमारे भोजन की थाली में ये प्लास्टिक के कण पहुंच गए हैं। ये कण इतने बारीक हैं कि वाष्पीकरण से बादलों में पहुंच जाते हैं और बारिश के द्वारा धरती के सुदूर ग्लैशियर, जंगल, पहाड़ सहित पृथ्वी के पोर-पोर में पहुंच गए हैं।
खून के जरिये हर अंग तक पहुंच रहे माइक्रो प्लास्टिक
मनुष्यों के हृदय, यकृत, गुर्दे और अब युवा पुरुषों के जनन अंगों में माइक्रो प्लास्टिक पाए जाने पर डाॅ. अजय ने कहा कि हमारे शरीर के हर अंग में रक्त का प्रवाह होता है। ये प्लास्टिक हमारे भोजन से हमारे खून में पहुंचे गया है तो तमाम अंगों में इसका मिलना कोई हैरत की बात नहीं है।