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छह साल से रूका वेतन, व्यवसाय भी लॉक डाउन में ठप
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) के पत्राचार संस्थान कर्मियों को छह साल से वेतन नहीं मिला है। कर्मचारियों ने रोजी-रोटी के लिए छोटा-मोटा व्यवसाय शुरू किया लेकिन लॉक डाउन में इस पर भी ताला लग गया। कर्मचारियों के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर पाना मुश्किल हो गया है और उन्होंने कुलपति से मदद की गुहार लगाई है।
पूर्व कुलपति प्रो. रतन लाल हांगलू के कार्यकाल में पत्राचार संस्थान बंद कर दिया गया था और संस्थान के कर्मचारियों का वेतन भी रोक दिया गया। कर्मचारियों को नवंबर 2014 से वेतन नहीं मिला है। इस दौरान तंगहाली और तनाव से जूझ रहे कुछ कर्मचारियों की मौत हो गई। संस्थान के 85 कर्मचारियों को अब भी वेतन मिलने का इंतजार है। तंगहाली के दौर में किसी कर्मचारी ने सब्जी की दुकान खोल ली तो कोई कर्मचारी किसी अन्य छोटे-मोटे व्यवसाय से जुड़ गया। लॉक डाउन में उनका व्यवसाय भी ठप हो गया और एक बार फिर उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा गया है। पत्राचार संस्थान के कर्मचारी डॉ. अजय कुमार त्रिपाठी का कहना है कि कर्मचारियों का वेतन रोके जाने संबंधी कोई लिखित आदेश नहीं हैं। कर्मचारियों की नियमित नियुक्ति हुई थी लेकिन उन्हें कहीं समायोजित भी नहीं किया गया।
जुलाई 2019 को हुई इलाहाबाद विश्वविद्यालय की कार्य परिषद की बैठक में संस्थान को बंद का करने प्रस्ताव आधिकारिक रूप से पारित कर केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के माध्यम से विजिटर के पास भेजा गया था लेकिन विजिटर ने अब तक इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी है। कर्मचारियों के तीन माह के वेतन पर एक करोड़ 20 लाख रुपये खर्च होने हैं जबकि संस्थान के वेतन मद में एक करोड़ 50 लाख रुपये हैं। संस्थान कर्मियों ने इन्हीं तथ्यों का हवाला देते हुए कुलपति से तीन माह का वेतन मांगा है ताकि लाक डाउन में उनकी गुजर-बसर हो सके।
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पूर्व कुलपति प्रो. रतन लाल हांगलू के कार्यकाल में पत्राचार संस्थान बंद कर दिया गया था और संस्थान के कर्मचारियों का वेतन भी रोक दिया गया। कर्मचारियों को नवंबर 2014 से वेतन नहीं मिला है। इस दौरान तंगहाली और तनाव से जूझ रहे कुछ कर्मचारियों की मौत हो गई। संस्थान के 85 कर्मचारियों को अब भी वेतन मिलने का इंतजार है। तंगहाली के दौर में किसी कर्मचारी ने सब्जी की दुकान खोल ली तो कोई कर्मचारी किसी अन्य छोटे-मोटे व्यवसाय से जुड़ गया। लॉक डाउन में उनका व्यवसाय भी ठप हो गया और एक बार फिर उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा गया है। पत्राचार संस्थान के कर्मचारी डॉ. अजय कुमार त्रिपाठी का कहना है कि कर्मचारियों का वेतन रोके जाने संबंधी कोई लिखित आदेश नहीं हैं। कर्मचारियों की नियमित नियुक्ति हुई थी लेकिन उन्हें कहीं समायोजित भी नहीं किया गया।
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जुलाई 2019 को हुई इलाहाबाद विश्वविद्यालय की कार्य परिषद की बैठक में संस्थान को बंद का करने प्रस्ताव आधिकारिक रूप से पारित कर केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के माध्यम से विजिटर के पास भेजा गया था लेकिन विजिटर ने अब तक इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी है। कर्मचारियों के तीन माह के वेतन पर एक करोड़ 20 लाख रुपये खर्च होने हैं जबकि संस्थान के वेतन मद में एक करोड़ 50 लाख रुपये हैं। संस्थान कर्मियों ने इन्हीं तथ्यों का हवाला देते हुए कुलपति से तीन माह का वेतन मांगा है ताकि लाक डाउन में उनकी गुजर-बसर हो सके।
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