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श्रद्धालुओं की कमी से आर्थिक संकट में फंसे संगम के नाविक और पुरोहित
Thu, 10 Jun 2021 10:38 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 10 Jun 2021 10:38 PM IST
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Prayagraj
- फोटो : Prayagraj
हजारों तीर्थयात्रियों की भीड़ से भरे रहने वाले संगम पर कोरोना कर्फ्यू खत्म होने के बाद रौनक नहीं आ सकी है। पड़ोसी राज्यों से तीर्थयात्री अभी नहीं आ रहे हैं। इससे संगमनगरी के तीर्थाटन पर छाए संकट के बादल अभी नहीं छंट सके हैं। ऐसी दशा में संगम के तीर्थपुरोहितों और नाविकों के समक्ष आर्थिक संकट गहरा गया है।
नावें खड़ी होने से सैकड़ों परिवारों की आजीविका पर असर पड़ गया है। पिछले ढाई महीने से तीर्थयात्रियों की आवाजाही न होने से वीआईपी किला घाट से लेकर संगम तक नाविकों केे सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। तीर्थयात्रियों के न आने से कमाई नहीं हो रही है।
ऐसे में बच्चों की पढ़ाई, दवाई के भी लाले पड़ गए हैं। अनुमान के तौर पर करीब तीन हजार नाविकों में से लगभग 75 प्रतिशत ऐसे हैं, जिनके सामने दूसरा धंधा करने की नौबत आ गई है। अगर वह ठेला,खोमचा खींचकर कमाएंगे नहीं तो फिर बच्चों का पेट नहीं पाल सकते। एक जून से प्रतिबंध हटने के बावजूद अभी भी गिनती के ही तीर्थयात्री संगम पहुंच रहे हैं। उसमें भी स्थानीय लोगों को छोड़ दिया जाए तो बाहर के यात्री न के बराबर हैं।
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इससे नाविकों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। संदीप निषाद बताते हैं कि कोविड -19 के खौफ से पड़ोसी राज्यों के अलावा दक्षिण भारत से श्रद्धालु संगम पर नहीं आ रहेे हैं। इसकी खास वजह से अभी ट्रेनों संचालन शुरू न होना। वह बताते हैं कि पहले कर्मकांड, अस्थि विसर्जन के अलावा संगम और किला घाट घूमने के लिए दिन भर नावों की लोग सवारी करते थे।
ऐसेे ही बाहरी यात्रियों पर नाविकों की जीविका निर्भर रहती है, लेकिन मौजूदा समय स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है। ऐसे में नाविक परिवार कर्ज में डूबते जा रहे हैं। अब दाल रोटी ऊधार ले कर चलाया जा रहा है। इसी तरह छोटेलाल निषाद बताते हैं कि जबतक ट्रेनों का संचालन शुरू नहीं होगा, तब तक इसी तरह मुश्किलें बरकरार रहेंगी। इसके लिए जरूरी है कि सरकार पहले प्रयागराज केे रूट वाली ट्रेनों का संचालन शुरू कराए,ताकि यहं तीर्थाटन आरंभ हो सके।
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नावें खड़ी होने से सैकड़ों परिवारों की आजीविका पर असर पड़ गया है। पिछले ढाई महीने से तीर्थयात्रियों की आवाजाही न होने से वीआईपी किला घाट से लेकर संगम तक नाविकों केे सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। तीर्थयात्रियों के न आने से कमाई नहीं हो रही है।
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ऐसे में बच्चों की पढ़ाई, दवाई के भी लाले पड़ गए हैं। अनुमान के तौर पर करीब तीन हजार नाविकों में से लगभग 75 प्रतिशत ऐसे हैं, जिनके सामने दूसरा धंधा करने की नौबत आ गई है। अगर वह ठेला,खोमचा खींचकर कमाएंगे नहीं तो फिर बच्चों का पेट नहीं पाल सकते। एक जून से प्रतिबंध हटने के बावजूद अभी भी गिनती के ही तीर्थयात्री संगम पहुंच रहे हैं। उसमें भी स्थानीय लोगों को छोड़ दिया जाए तो बाहर के यात्री न के बराबर हैं।
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इससे नाविकों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। संदीप निषाद बताते हैं कि कोविड -19 के खौफ से पड़ोसी राज्यों के अलावा दक्षिण भारत से श्रद्धालु संगम पर नहीं आ रहेे हैं। इसकी खास वजह से अभी ट्रेनों संचालन शुरू न होना। वह बताते हैं कि पहले कर्मकांड, अस्थि विसर्जन के अलावा संगम और किला घाट घूमने के लिए दिन भर नावों की लोग सवारी करते थे।
ऐसेे ही बाहरी यात्रियों पर नाविकों की जीविका निर्भर रहती है, लेकिन मौजूदा समय स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है। ऐसे में नाविक परिवार कर्ज में डूबते जा रहे हैं। अब दाल रोटी ऊधार ले कर चलाया जा रहा है। इसी तरह छोटेलाल निषाद बताते हैं कि जबतक ट्रेनों का संचालन शुरू नहीं होगा, तब तक इसी तरह मुश्किलें बरकरार रहेंगी। इसके लिए जरूरी है कि सरकार पहले प्रयागराज केे रूट वाली ट्रेनों का संचालन शुरू कराए,ताकि यहं तीर्थाटन आरंभ हो सके।