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हाईकोर्ट ने कहा : मां की शक्ति को कम करके नहीं आंका  जा सकता, संतान को प्यार मिलना जरूरी

Fri, 22 Apr 2022 09:16 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 22 Apr 2022 09:16 PM IST
सार

कोर्ट ने हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम-1956 की धारा 6 (ए) को ध्यान में रखते हुए कहा कि यह प्रावधान संरक्षकता के भेद में अंतरिम कस्टडी के अपवाद को बताता है और  निर्दिष्ट करता है कि जब तक बच्चा पांच साल से कम उम्र का है तब तक बच्चे को मां की ही कस्टडी में रखा जाना चाहिए।

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power of the mother cannot be underestimated, it is necessary for the child to get love - High Court said
Prayagraj News : इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : प्रयागराज

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो बच्चों की कस्टडी उनकी मां को सौंपते हुए कहा कि मां की शक्ति को कम करके आंका नहीं जा सकता। मां का आशीर्वाद बच्चों को मिलना ही चाहिए। एक बच्चे के जीवन में विश्वास और भावनात्मक अंतरंगता की मजबूत नींव स्थापित करने के लिए मां का प्यार जरूरी है। यह आदेश न्यायमूर्ति राहुल चतुर्वेदी की पीठ ने सीमा शर्मा की तरफ  से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने दादी के साथ रह रहे दोनों बच्चों की कस्टडी को उनकी मां को सौंप दिया।

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याची सीमा शर्मा की शादी मार्च 2016 में कपिल शर्मा से हुई थी। कपिल शर्मा ने आत्महत्या कर ली। दोनों से पांच साल की बेटी और ढाई साल का बेटा है। पति की आत्महत्या के मामले में सीमा शर्मा को पांच अन्य लोगों के साथ आरोपी बनाया गया है। मामले की जांच अभी चल रही है और अभी तक कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है। पति की मृत्यु के बाद याची अपनी बहन के साथ मुरादाबाद में रहने लगी। जबकि, उसके बच्चे उनकी दादी के पास रह रहे हैं। इसलिए सीमा ने दोनों बच्चों की कस्टडी के लिए हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की थी।

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बच्चे को लेकर मां और दादी में चल रहा है विवाद

कोर्ट ने हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम-1956 की धारा 6 (ए) को ध्यान में रखते हुए कहा कि यह प्रावधान संरक्षकता के भेद में अंतरिम कस्टडी के अपवाद को बताता है और  निर्दिष्ट करता है कि जब तक बच्चा पांच साल से कम उम्र का है तब तक बच्चे को मां की ही कस्टडी में रखा जाना चाहिए। मामले में बच्चों की कस्टडी को लेकर दादी और मां के बीच विवाद चल रहा है। कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंची कि मां बच्चों की प्राकृतिक अभिभावक होने के नाते दादी या उनके पिता की बहन (बुआ) की तुलना में बहुत अधिक ऊंचे पायदान पर खड़ी है। एक बच्चे के जीवन में मां के प्रेम की आवश्यकता अधिक है।

बच्चे खेलने की वस्तु नहीं, उनका कल्याण सर्वोपरि
कोर्ट ने कहा कि बच्चे अपने माता-पिता के खेलने की चीजें नहीं हैं। उनका कल्याण सर्वोपरि है और जब मां उनके साथ होगी तो उनकी अच्छी तरह से रक्षा हो सकेगी। एक बच्चे के जीवन में विश्वास और भावनात्मक अंतरंगता की मजबूत नींव स्थापित करने के लिए मां का प्यार बिना शर्त के मिलना चाहिए। अगर इस प्यार को रोक दिया जाता है तो बच्चा इस प्यार को पाने केलिए कई तरीकों से ढूंढेगा।


हम अपने बच्चों को घर पर जो भावनात्मक नींव देते हैं वह उनके जीवन की नींव है। हम घर के मूल्य और एक मां के प्यार की शक्ति को कम करके नहीं आंक सकते हैं। कोर्ट ने बच्चों के प्रति मां के अधिकार को प्रमुखता दी और बच्चों को उनकी मां को सौंप दिया। हालांकि, कोर्ट ने दादी को भी यह अधिकार दिया कि वह चाहे तो सप्ताह में एक बार यानी प्रत्येक शनिवार को दोपहर 12.00 बजे से शाम 05.00 बजे के बीच अपने पौत्र-पौत्री से मिल सकती है।

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