पितृ विसर्जन : पितरों के तर्पण के लिए संगम पर उमड़ा सैलाब, विधि-विधान से विदा किए गए पुरखे
पितृ विसर्जन अमावस्या के दिन धरती पर आए पितरों को याद करके उनकी विदाई की जाती है। पूरे पितृ पक्ष में पितरों को याद न किया गया हो तो अमावस्या को उन्हें याद करके दान किया जाता है। इससे पितरों को शांति मिलती है। मान्यता है कि इसदिन सभी पितर अपने परिजनों के घर के द्वार पर बैठे रहते हैं।
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सर्व पितृ अमावस्या के मौके पर संगम तट पर भारी भीड़ उमड़ी। वंशजों ने विधि विधान के साथ तर्पण कर अपने पितरों को विदा किया। दाहिने हाथ में कुशा की पवित्री पहनकर जल, काले तिल, सफेद फूल और चवल से तर्पण किया। संगम तट पर पितरों के लिए दक्षिण दिशा की ओर 14 दीप जलाया। उनसे हुई भूलचूक की माफी मांग कर अपने स्थान पर जाने की प्रार्थना की गई। सर्वपितृ अमावस्या के दिन पीपल की पूजा का भी विशेष विधान है, क्योंकि मान्यता है कि इस पर पितरों का वास होता है।
पितृ विसर्जन अमावस्या के दिन धरती पर आए पितरों को याद करके उनकी विदाई की जाती है। पूरे पितृ पक्ष में पितरों को याद न किया गया हो तो अमावस्या को उन्हें याद करके दान किया जाता है। इससे पितरों को शांति मिलती है। मान्यता है कि इसदिन सभी पितर अपने परिजनों के घर के द्वार पर बैठे रहते हैं।
हिंदू धर्म में पितृ पक्ष के आखिरी दिन सर्व पितृ अमावस्या को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। इसी दिन पितरों को विदाई दी जाती है। पितरों को जल देते वंशों ने पहले अपने गोत्र का नाम लिया इसके बाद तर्पण किया। इस दौरान अस्मतपितामह वसुरूपत् तृप्यतमिदं तिलोदकम गंगा जलं वा तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः मंत्र बोला गया।
संगम की तरफ आने वाले हर रास्ते पर भीड़ दिखी। इससे जाम की स्थित पैदा हो गई थी। सुबह से ही संगम तट पर विसर्जन के लिए लोग पहुंचने लगे थे। दोपहर होते होते संगम सहित सारे घाट भर गए थे। फाफामऊ, दारागंज, बलुआ घाट, दशाश्वमेध घाट, काशीराज घाट, नागवासुकि, छतनाग घाट सहित अरैल घाट पर भी भारी भीड़ दिखी। गंगा सहित ग्रामीण इलाकोंं में यमुना के किनारे भी लोगों ने पिंडदान कर पितरो को विधि विधान से विदा किया। पितृ पक्ष में अमावस्या तिथि नाराज पितरों को खुश करने का अंतिम दिन होता है। क्योंकि पितृ पक्ष में धरती पर आए पितर वापस पितृ लोक जाते हैं।