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सर्जरी की अनुमति से आयुर्वेद चिकित्सकों में बढ़ा उत्साह
Wed, 25 Nov 2020 01:28 AM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Wed, 25 Nov 2020 01:28 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
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आयुर्वेद के स्नातकोत्तर (पीजी) छात्रों को केंद्र सरकार की ओर से सामान्य सर्जरी की अनुमति देने से आयुर्वेदिक चिकित्सकों में उत्साह बढ़ा है। आयुर्वेद चिकित्सक इसे पांच हजार साल पुरानी सुश्रुत विधा का सम्मान बता रहे हैं। वहीं एलोपैथ के एमबीबीएस, एमडी डॉक्टरों के साथ सर्जन इस निर्णय से खुश नहीं हैं। उनका कहना है कि विशेषज्ञता की कमी से मिश्रित पैथी चिकित्सा जगत को संदेह के घेरे में खड़ा करेगी। इससे जनहित प्रभावित होगा। बिना प्रशिक्षण परिणाम ठीक नहीं मिलेगा, मरीज परेशान होंगे।
हंडिया आयुर्वेद पीजी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य आयुर्वेदाचार्य डॉ. जीएस तोमर का कहना है कि सरकार ने पुरानी पद्धति को सम्मान और आयुष चिकित्सकों को उनका हक दिया है। यह सराहनीय कदम है। आयुर्वेंद पांच हजार साल पुरानी प्रतिष्ठा को हासिल करेगा।
डॉ. तोमर ने कहा कि पांच हजार वर्ष पहले सुश्रुत ने जो किया, उसकी वजह से उन्हें फादर ऑफ सर्जरी कहा जाता है। उन्होंने पहली ब्रेन सर्जरी की थी। आयुर्वेद से प्राचीन काल में नाक और कान की सर्जरी की जाती थी। पुराणों में इसका वर्णन है। बौद्ध काल में आयुर्वेद का क्षरण हुआ। ब्रिटिश काल में आयुर्वेद की पुस्तकों के आधार पर अंग्रेजों ने लंदन में सर्जरी के लिए आयुर्वेद के सिद्धांतों के आधार पर 101 यंत्र और 20 शस्त्र के आधार पर उपकरणों को आधुनिक रूप के साथ नई टेक्नालॉजी के तहत विकसित किया। आयुर्वेद चिकित्सकों को सर्जरी की अनुमति देना जनहितकारी कदम है।
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आयुर्वेदाचार्य डॉ. आशुतोष मालवीय आयुर्वेद में शल्य एवं शलाक्य तंत्र के तहत शल्य चिकित्सा की अनुमति थी। सर्जरी विद्या आष्टांग आयुर्वेद में पढ़ाया जाता था, लेकिन प्रयोगात्मक नहीं था। अब आयुर्वेद चिकित्सकों को सर्जरी की अनुमति देना सरकार का सराहनीय निर्णय है, इससे आयुर्वेद का विकास और प्रसार से लोगों को लाभ होगा। वैद्य मालवीय के मुताबिक पहले आयुर्वेद की डिग्री का स्वरूप बदल गया है। अब छात्रों को इंट्रीगेटेड डिग्री दी जाती है। बीएएमएस की पढ़ाई में मार्डन फार्मोफोबिया पढ़ाया जा रहा है। चिकित्सक सर्जरी योग्य बन रहे हैं। आयुर्वेद
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हंडिया आयुर्वेद पीजी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य आयुर्वेदाचार्य डॉ. जीएस तोमर का कहना है कि सरकार ने पुरानी पद्धति को सम्मान और आयुष चिकित्सकों को उनका हक दिया है। यह सराहनीय कदम है। आयुर्वेंद पांच हजार साल पुरानी प्रतिष्ठा को हासिल करेगा।
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डॉ. तोमर ने कहा कि पांच हजार वर्ष पहले सुश्रुत ने जो किया, उसकी वजह से उन्हें फादर ऑफ सर्जरी कहा जाता है। उन्होंने पहली ब्रेन सर्जरी की थी। आयुर्वेद से प्राचीन काल में नाक और कान की सर्जरी की जाती थी। पुराणों में इसका वर्णन है। बौद्ध काल में आयुर्वेद का क्षरण हुआ। ब्रिटिश काल में आयुर्वेद की पुस्तकों के आधार पर अंग्रेजों ने लंदन में सर्जरी के लिए आयुर्वेद के सिद्धांतों के आधार पर 101 यंत्र और 20 शस्त्र के आधार पर उपकरणों को आधुनिक रूप के साथ नई टेक्नालॉजी के तहत विकसित किया। आयुर्वेद चिकित्सकों को सर्जरी की अनुमति देना जनहितकारी कदम है।
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आयुर्वेदाचार्य डॉ. आशुतोष मालवीय आयुर्वेद में शल्य एवं शलाक्य तंत्र के तहत शल्य चिकित्सा की अनुमति थी। सर्जरी विद्या आष्टांग आयुर्वेद में पढ़ाया जाता था, लेकिन प्रयोगात्मक नहीं था। अब आयुर्वेद चिकित्सकों को सर्जरी की अनुमति देना सरकार का सराहनीय निर्णय है, इससे आयुर्वेद का विकास और प्रसार से लोगों को लाभ होगा। वैद्य मालवीय के मुताबिक पहले आयुर्वेद की डिग्री का स्वरूप बदल गया है। अब छात्रों को इंट्रीगेटेड डिग्री दी जाती है। बीएएमएस की पढ़ाई में मार्डन फार्मोफोबिया पढ़ाया जा रहा है। चिकित्सक सर्जरी योग्य बन रहे हैं। आयुर्वेद