High Court : कलरब्लाइंडनेस के कारण बर्खास्त किए गए कांस्टेबल को बहाल करने का आदेश
याची के अधिवक्ता हिमांशु गौतम ने कोर्ट को बताया कि याची की पुलिस विभाग में मेडिकल परीक्षा के बाद एक सितंबर 2006 को कांस्टेबल के पद पर नियुक्ति हुई थी। इसके बाद उसने नौ माह का प्रशिक्षण लिया।
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने राज्य सरकार को कलर ब्लाइंडनेस (वर्णान्धता) के कारण पुलिस विभाग से बर्खास्त किए गए कांस्टेबल को बहाल करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने एसपी अंबेडकर नगर के आदेश को रद्द करते हुए याची को पचास फीसदी बकाया वेतन देने का भी निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति बृजराज सिंह ने जौनपुर निवासी याची ओम प्रकाश चौधरी की याचिका समेत चार अन्य याचिकाओंं की सुनवाई करते हुए दिया है।
याची के अधिवक्ता हिमांशु गौतम ने कोर्ट को बताया कि याची की पुलिस विभाग में मेडिकल परीक्षा के बाद एक सितंबर 2006 को कांस्टेबल के पद पर नियुक्ति हुई थी। इसके बाद उसने नौ माह का प्रशिक्षण लिया। उसे अंबेडकरनगर में तैनाती मिली। वर्ष 2007 में डीजीपी की ओर से जारी आदेश में मेडिकल बोर्ड को उन सभी पुलिस कर्मियोंं के दोबारा स्वास्थ्य परीक्षण का आदेश जारी किया गया, जिनकी वर्ष 2004 से 2007 की बीच नियुक्ति हुई थी।
याची का जब मेडिकल परीक्षण किया गया तो उसे कलर ब्लाइंडनेस का शिकार पाया गया। इस आधार पर याची की सेवाएं वर्ष 2007 में समाप्त कर दी गईं। याची ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची के अधिवक्ता का कहना था कि चूंकि याची की नियुक्ति हो चुकी थी और वह सेवा मेंं था। उन्होंने 1995 एक्ट के अनुच्छेद 33 का हवाला दिया, जिसमें एक फीसदी ऐसे लोगों के लिए पद आरक्षित रखने के लिए कहा गया है जो कि दृष्टिबाधित अथवा बधिर हैं।
कहा गया कि याची यदि इस पद के लिए योग्य नहीं है तो उसे उसी वेतनमान पर किसी दूसरे पद पर स्थानांतरित कर दिया जाए। अधिवक्ता का कहना था चूंकि जब याची की नियुक्ति हुई थी तो उसे कलर ब्लाइंडनेस नहीं थी, इसलिए उसे इस बीमारी के आधार पर सेवा से बर्खास्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक अंबेडकर नगर के आदेश को खारिज करते हुए याची को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है।