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कारगिल विजय दिवस विशेष : युद्धभूमि के साथ मोर्चे के पीछे भी सैनिकों ने रची जीत की कहानी

Sun, 26 Jul 2026 07:10 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 26 Jul 2026 07:10 PM IST
सार

कारगिल युद्ध में हर सैनिक की जिम्मेदारी अलग थी लेकिन लक्ष्य एक ही था भारत की जीत। किसी ने हथियारों की उपलब्धता सुनिश्चित की, किसी ने दुश्मन के रेडियो संचार को बाधित किया।

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Kargil Vijay Diwas Special: Soldiers scripted a story of victory not just on the battlefield
कारगिल विजय दिवस 2026 - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

कारगिल युद्ध में हर सैनिक की जिम्मेदारी अलग थी लेकिन लक्ष्य एक ही था भारत की जीत। किसी ने हथियारों की उपलब्धता सुनिश्चित की, किसी ने दुश्मन के रेडियो संचार को बाधित किया। किसी ने मोर्चे के पीछे रहकर युद्धक संसाधनों की कमान संभाली। कारगिल विजय दिवस पर प्रयागराज के पूर्व सैनिकों ने उन जिम्मेदारियों को याद करते हुए अनुभव साझा किए।

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प्रयागराज में दिन-रात जारी रही सैन्य तैयारी

पूर्व वायुसेना कर्मी ओम प्रकाश उपाध्याय बताते हैं कि वह उस समय फ्लाइंग विंग में आर्मामेंट फिटर (आर्मरर) थे। उनकी जिम्मेदारी हथियारों, विस्फोटकों और सैन्य स्टोर की उपलब्धता बनाए रखने के साथ जरूरत पड़ने पर उनकी आपूर्ति सुनिश्चित करना था। प्रयागराज ऑपरेशनल स्टेशन नहीं था इसलिए यहां से सीधे युद्ध में हिस्सा नहीं लिया गया। हालांकि दूसरे डिपो से सैन्य सामग्री लाकर यहां स्टैंडबाय रखी जाती थी। युद्ध के दौरान एक्सप्लोसिव स्टोर की निगरानी, एयरक्राफ्ट की तैयारी, इमरजेंसी लैंडिंग की स्थिति में आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराना और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए 24 घंटे शिफ्टवार ड्यूटी चलती थी।
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दुश्मन की बातें सुनकर बनाई रणनीति

कारगिल युद्ध में जीत गोलियों और तोपों के साथ संचार युद्ध (कम्युनिकेशन वॉरफेयर) ने भी अहम भूमिका निभाई थी। सेना की सिग्नल कोर से सेवानिवृत्त धूमनगंज निवासी बीएन सिंह बताते हैं कि युद्ध के दौरान जम्मू-कश्मीर के पुंछ सेक्टर में तैनाती थी। टीम ने कई दिनों तक दुश्मन का रेडियो संचार बाधित रखा। इससे पाकिस्तानी सैनिक अपने अधिकारियों से संपर्क नहीं कर सके और रसद व गोला-बारूद की मांग की आपूर्ति बाधित हो गई। कई बार दुश्मन की बातचीत से यह जानकारी भी मिल जाती थी कि किस इलाके में कितनी सेना है और कहां हथियार या गोला-बारूद रखा गया है। ये सूचनाएं वे भारतीय अधिकारियों तक पहुंचाते थे, जिसके आधार पर रणनीति बनाई जाती थी।
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रात होते ही शुरू होती थी असली ड्यूटी

नैनी निवासी सेना के पूर्व अधिकारी उदय मान सिंह ने कहते हैं कि उनका काम टैंक, तोप, गोला-बारूद और राइफल को युद्धकाल में चालू हालत में रखना था। सर्विसेज की टुकड़ी सीधे युद्ध क्षेत्र से महज एक किमी पीछे तैनात रहती थी और यही सबसे खतरनाक हिस्सा होता था। दुश्मन की गोलाबारी अक्सर पीछे की सप्लाई और कनेक्शन तोड़ने के लिए होती थी। उदय बताते हैं बारिश और कीचड़ से सनी जमीन। न सोने का ठिकाना तय, न खाने का समय और टेंट लगाने से पहले ही अगला आदेश आ जाता था कि दो किमी और बढ़ना है। वह समय बेहद कठिन था लेकिन भारत की जीत ने सारी तकलीफें भुला दीं।

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