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हाईकोर्ट का अहम फैसला : ऋण अदा होने के बाद कागजात बंधक नहीं रख सकते
Fri, 29 May 2026 07:09 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Fri, 29 May 2026 07:09 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ऋण पूरा अदा होने के बाद बैंक मूल दस्तावेज को बंधक नहीं रख सकता। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने बैंक ऑफ इंडिया को गाजियाबाद निवासी सीमा जैन के मकान के मूल कागजात दो हफ्ते में लौटाने आदेश दिया है।
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अदालत का फैसला।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ऋण पूरा अदा होने के बाद बैंक मूल दस्तावेज को बंधक नहीं रख सकता। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने बैंक ऑफ इंडिया को गाजियाबाद निवासी सीमा जैन के मकान के मूल कागजात दो हफ्ते में लौटाने आदेश दिया है।
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याची ने 2002 में गाजियाबाद में मकान खरीदा था। नगर निगम में उसकी दाखिल-खारिज की कार्यवाही पूरी कर ली गई थी। इसके बाद करीब 10 साल से वह वहीं रह रही थीं। 2012 में बैंक ऑफ इंडिया ने उन्हें एक नोटिस भेजा। मकान पर कब्जा करने की चेतावनी दी। कहा, मकान की पूर्व मालकिन अपने बेटे के पांच लाख रुपये के ऋण में गारंटर थीं।
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ऋण न चुकाने के कारण देनदारी बढ़कर 22 लाख रुपये से अधिक हो चुकी थी, मकान बंधक है। इसके बाद बैंक ने याची संग समझौता करते हुए 5,50,000 रुपये जमा कराए और नोड्यूज प्रमाणपत्र भी जारी कर दिया। वहीं, मकान के मूल कागजात लौटाने को यह कहते हुए मना कर दिया कि नियमानुसार केवल मूल ऋणी या उसके गारंटर को ही दिया जा सकता है।
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इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अधिवक्ता ने दलील दी कि तत्कालीन बैंक मैनेजर ने माना था कि न मूल गारंटर जीवित नहीं है और उसके बेटे का भी कोई पता नहीं है। दोनों का मिलना असंभव है। ऐसी स्थिति में ऋण की पूरी अदायगी के बाद मूल कागजात को बंधक बनाए रखना बैंक का मनमाना रवैया है।
वहीं, बैंक के वकील ने दलील दी कि याची न तो बैंक की सीधी ग्राहक है और न ही ऋणी। इसलिए गिरवी रखे गए दस्तावेज पर उसका कोई कानूनी हक नहीं है। कोर्ट ने यह भी पाया कि याची को बेटी की शादी के लिए ऋण की जरूरत है, लेकिन मकान के मूल कागजात के अभाव में वह ऋण नहीं ले पा रही।
कोर्ट ने कागजात दो हफ्ते में लौटने का आदेश दिया। कहा कि मकान विक्रय और दाखिल खारिज के दौरान बैंक ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई। इसके संबंधी में कोई मुकदमा लंबित नहीं है। बैंक खुद स्वीकार करता है कि मूल ऋणी और गारंटर का मिलना संभव नहीं तो मूल कागजात बंधक बनाए रखने का कोई हक नहीं है।