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हाईकोर्ट ने कहा : बयानों में भिन्नता और साक्ष्य का अभाव, तो आरोपी को संदेह का लाभ मिलना चाहिए

Sun, 20 Sep 2026 07:28 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 20 Sep 2026 07:28 PM IST
सार

गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण भिन्नता और घटना की पुष्टि करने वाला चिकित्सकीय साक्ष्य मौजूद न होने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ दिए जाने के सिद्धांत को दोहराया है।

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If there are discrepancies in the witnesses' statements and a lack of medical evidence
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास हो और आरोपों का समर्थन करने वाला मेडिकल साक्ष्य न हो तो आरोपी को संदेह का लाभ मिलना चाहिए। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति हरवीर सिंह की एकल पीठ ने दुष्कर्म के मामले में कालू को ट्रायल कोर्ट से मिली सजा रद्द कर आरोपों से बरी कर दिया।

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कोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म का अपराध गंभीर प्रकृति का है। इसमें पीड़िता का बयान विशेष महत्व रखता है, लेकिन पूरी कहानी असंभव और विसंगतियों से भरी हो तो बिना ठोस सबूतों के किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। गाजियाबाद के नोएडा थाने में 1985 में दुष्कर्म के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। आरोप था कि पीड़िता खेत से चारा लेने जा रही थी। इसी दौरान रमेश और कालू ने उसके साथ दुष्कर्म किया। ट्रायल कोर्ट ने नौ मार्च 1988 को दोनों को 10 साल की सजा सुनाई थी।

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आरोपियों ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हालांकि, हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान सह-अभियुक्त रमेश की मृत्यु हो गई। ऐसे में सिर्फ कालू की अपील पर सुनवाई की गई। कोर्ट ने पाया कि डॉक्टर की जांच रिपोर्ट में पीड़िता के शरीर पर और निजी अंगों पर कोई आंतरिक या बाहरी चोट का निशान नहीं मिला था।
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कोर्ट ने टिप्पणी की कि दो पुरुष किसी महिला को उबड़-खाबड़ खेत में जबरन खींचते हैं तो शरीर पर हल्की खरोंच या चोट न आना स्वाभाविक नहीं है। साथ ही एफआईआर और अदालत में दी गई गवाही में इस बात को लेकर विरोधाभास पैदा हुआ कि पहले अपराध किसने किया। अभियोजन पक्ष ने घटना के एक प्रमुख गवाह तेज सिंह को भी अदालत में पेश नहीं किया। इससे अभियोजन की कहानी पर गहरा संदेह पैदा होता है।

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