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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   If the very presence of the eyewitness is doubtful, a conviction cannot be based on their testimony.

हाईकोर्ट : चश्मदीद की मौजूदगी ही संदिग्ध है तो उसकी गवाही पर नहीं दी जा सकती सजा

Thu, 10 Sep 2026 07:51 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 10 Sep 2026 07:51 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी मामले में मुख्य चश्मदीद की घटनास्थल पर मौजूदगी ही संदिग्ध है तो उसकी मौखिक गवाही के आधार पर किसी को आजीवन कारावास की सजा नहीं दी जा सकती।

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If the very presence of the eyewitness is doubtful, a conviction cannot be based on their testimony.
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी मामले में मुख्य चश्मदीद की घटनास्थल पर मौजूदगी ही संदिग्ध है तो उसकी मौखिक गवाही के आधार पर किसी को आजीवन कारावास की सजा नहीं दी जा सकती। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने 2005 के एक चर्चित हत्या मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को निरस्त कर दो अभियुक्तों को बरी कर दिया है।

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यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने दिया है। मामला मैनपुरी के बेवर थाना क्षेत्र का है। तीन अगस्त-2005 को वीरपाल सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना के समय उनके चचेरे भाई सरकारी स्कूल के हेडमास्टर खुशीराम ने खुद को चश्मदीद बताया था। ट्रायल कोर्ट ने 2007 में उनकी गवाही के आधार पर अभियुक्तों सुखराम, जीतराज और औसान सिंह को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले को आरोपियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। अपील लंबित रहने के दौरान सुखराम की मौत होने के चलते उनकी अपील समाप्त कर दी गई थी।

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कोर्ट ने पाया कि घटना सुबह 8:00 बजे की है, जबकि उस समय गवाह की स्कूल में आधिकारिक ड्यूटी थी। जांच अधिकारी ने गवाह के स्कूल के हाजिरी रजिस्टर या छुट्टी के रिकॉर्ड का सत्यापन तक नहीं किया था। हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी की इस लापरवाही को गंभीर चूक माना। इसके अलावा पुलिस न तो घटना में प्रयुक्त हथियारों की बैलिस्टिक जांच करा सकी और न ही मौके से बरामद कारतूस या मृतक के शरीर से निकाली गईं गोलियों का अभियुक्तों के हथियारों से कोई वैज्ञानिक मिलान साबित कर पाई।

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कोर्ट ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली में साबित करने का पूरा भार अभियोजन पक्ष पर होता है। उसे अपना मामला हर तरह के संदेह से परे साबित करना होता है। इन तमाम विरोधाभासों और जांच की कमियों को देखते हुए पीठ ने अभियुक्त जीतराज और औशान सिंह को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का आदेश दिया है।

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