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मैं झुक जाता तो मसला खत्म हो जाता पर मेरे किरदार का कत्ल हो जाता : ब्रजभूषण
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मैं झुक जाता तो मसला खत्म हो जाता पर मेरे किरदार का कत्ल हो जाता : ब्रजभूषण
प्रयागराज। भोजपुरी संगम और स्वाती फाउंडेशन की ओर से आयोजित महोत्सव में पूर्व सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह ने कहा कि जरूरी नहीं कि सभी भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल ही किया जाए। आवश्यक यह है कि हम उसमें रचें बसें। भोजपुरी बोलने में हमें शर्म नहीं, बल्कि गर्व करना चाहिए। शायराना अंदाज में उन्होंने कहा कि ..मैं झुक जाता तो मसला खत्म हो जाता पर मेरे किरदार का कत्ल हो जाता। उन्होंने इस संबंध में किसी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन इसे महिला कुश्ती खिलाड़ियों से हुए विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है।
उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति की मातृभाषा ही उसके विकास की जड़ में होती है, जितना भाषा का विकास होगा, उतना ही उस क्षेत्र का बौद्धिक विकास होगा। वहीं, विशिष्ट अतिथि पूर्व मंत्री स्वाती सिंह ने कहा कि जिस भाषा में हमने बोलना सीखा है, जिसने हमें अपनत्व का बोध कराया है। वह निश्चय ही हमारी मां से कम नहीं है। उन्होंने कहा, “हमहूं ये भोजपुरी माई के पूज के बड़ भइल हईं। बलिया के धरती पर जनम बा हमार। अउरी आप सबक आशीर्वाद के कारण कबहूं आपन माटी पर कलंक ना लागे देहनी।
विशिष्ट अतिथि कुश्ती संघ के अध्यक्ष संजय सिंह ने कहा कि भोजपुरी में ही नहीं, भोजपुरी समाज के लोगों में भी जो मिठास है, वह अन्य कहीं नहीं दिख सकता। इस दौरान डॉ. उदेश्वर सिंह, अमित अनजान, डॉ. ज्वाला प्रसाद, डॉ. चंद्रभूषण राय, पंकज गांधी आदि ने भी अपने विचार रखे।
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संयोजक अजीत विक्रम सिंह और अजीत सिंह ने अतिथियों का धन्यवाद देते हुए कहा कि भोजपुरी प्यार की भाषा के साथ-साथ वक्त पड़ने पर दबंग की भी भाषा है। भोजपुरी में जो प्यार है वह कहीं नहीं मिल सकता। इससे जितना अधिक जुड़ेंगे, उतना अधिक भावनाओं से ओत-प्रोत होंगे।
वहीं, द्वितीय सत्र कवि सम्मेलन में डॉ. श्लेष गौतम ने पढ़ा कि हरा बैंगनी लाल पियरना... रंग बिरंगा चाही इंद्रधनुख न चाही हमके हमें तिरंगा चाही... पढ़कर लोगों को आनंदित किया। इसके बाद कवि देवकांत पांडेय ने भोजपुरी में कहा कि निहारो बा तेज घाम में... तेही जरत बा भूख प्यास से चूर रही... ऐ साहब तनी नजर घुमा बा... देश के हम मजदूर है...। फिर विनम्र सेन सिंह ने कहा कि हम अपने सपने में अपने के खोजी लारो... गांव में हिराय गइल गउंवा के खोजी लारो...सुनाया तो खूब वाहवाही लूटी। इस मौके पर मनोज भावुक, संजीव त्यागी आदि ने कविता पाठ कर समाज और भोजपुरी भाषा पर भावनाओं के माध्यम से अपने विचार रखे।
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प्रयागराज। भोजपुरी संगम और स्वाती फाउंडेशन की ओर से आयोजित महोत्सव में पूर्व सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह ने कहा कि जरूरी नहीं कि सभी भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल ही किया जाए। आवश्यक यह है कि हम उसमें रचें बसें। भोजपुरी बोलने में हमें शर्म नहीं, बल्कि गर्व करना चाहिए। शायराना अंदाज में उन्होंने कहा कि ..मैं झुक जाता तो मसला खत्म हो जाता पर मेरे किरदार का कत्ल हो जाता। उन्होंने इस संबंध में किसी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन इसे महिला कुश्ती खिलाड़ियों से हुए विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है।
उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति की मातृभाषा ही उसके विकास की जड़ में होती है, जितना भाषा का विकास होगा, उतना ही उस क्षेत्र का बौद्धिक विकास होगा। वहीं, विशिष्ट अतिथि पूर्व मंत्री स्वाती सिंह ने कहा कि जिस भाषा में हमने बोलना सीखा है, जिसने हमें अपनत्व का बोध कराया है। वह निश्चय ही हमारी मां से कम नहीं है। उन्होंने कहा, “हमहूं ये भोजपुरी माई के पूज के बड़ भइल हईं। बलिया के धरती पर जनम बा हमार। अउरी आप सबक आशीर्वाद के कारण कबहूं आपन माटी पर कलंक ना लागे देहनी।
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विशिष्ट अतिथि कुश्ती संघ के अध्यक्ष संजय सिंह ने कहा कि भोजपुरी में ही नहीं, भोजपुरी समाज के लोगों में भी जो मिठास है, वह अन्य कहीं नहीं दिख सकता। इस दौरान डॉ. उदेश्वर सिंह, अमित अनजान, डॉ. ज्वाला प्रसाद, डॉ. चंद्रभूषण राय, पंकज गांधी आदि ने भी अपने विचार रखे।
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संयोजक अजीत विक्रम सिंह और अजीत सिंह ने अतिथियों का धन्यवाद देते हुए कहा कि भोजपुरी प्यार की भाषा के साथ-साथ वक्त पड़ने पर दबंग की भी भाषा है। भोजपुरी में जो प्यार है वह कहीं नहीं मिल सकता। इससे जितना अधिक जुड़ेंगे, उतना अधिक भावनाओं से ओत-प्रोत होंगे।
वहीं, द्वितीय सत्र कवि सम्मेलन में डॉ. श्लेष गौतम ने पढ़ा कि हरा बैंगनी लाल पियरना... रंग बिरंगा चाही इंद्रधनुख न चाही हमके हमें तिरंगा चाही... पढ़कर लोगों को आनंदित किया। इसके बाद कवि देवकांत पांडेय ने भोजपुरी में कहा कि निहारो बा तेज घाम में... तेही जरत बा भूख प्यास से चूर रही... ऐ साहब तनी नजर घुमा बा... देश के हम मजदूर है...। फिर विनम्र सेन सिंह ने कहा कि हम अपने सपने में अपने के खोजी लारो... गांव में हिराय गइल गउंवा के खोजी लारो...सुनाया तो खूब वाहवाही लूटी। इस मौके पर मनोज भावुक, संजीव त्यागी आदि ने कविता पाठ कर समाज और भोजपुरी भाषा पर भावनाओं के माध्यम से अपने विचार रखे।