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राजमार्ग घोटाला: घोटाले के आरोपी पीडब्ल्यूडी चीफ इंजीनियर के खिलाफ याचिका खारिज
Tue, 07 Jul 2020 07:48 PM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Tue, 07 Jul 2020 07:48 PM IST
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- फोटो : court
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली से बदायूं के बीच सड़क बनाने में हुए करोड़ों रुपये के घोटाले के आरोपी चीफ इंजीनियर के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका खारिज कर दी है।
कोर्ट ने कहा कि यह नियोक्ता का कार्य है कि वह किससे कौन सा काम लेना चाहता है। अदालत इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगी। आरोपी चीफ इंजीनियर के खिलाफ चार्जशीट पहले ही दाखिल हो चुकी है। प्रयागराज के भाजपा कार्यकर्ता दिवाकर त्रिपाठी की जनहित याचिका पर मुख्य न्यायमूर्ति गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति एसडी सिंह की पीठ ने सुनवाई की।
याचिका में मांग की गई थी कि वर्तमान में आरोपी चीफ इंजीनियर को प्रयागराज लोक निर्माण विभाग में पोस्टिंग दी गई है। इनको यहां से हटाया जाए। ताकि उनके खिलाफ निष्पक्ष जांच हो सके। कोर्ट को बताया गया कि आरोपी चीफ इंजीनियर के खिलाफ विभागीय जांच चल रही है।
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उनको चार्जशीट भी दी गई है। इसके बावजूद न सिर्फ उनको प्रयागराज में नियुक्ति दी गई बल्कि कौशांबी का अतिरिक्त प्रभार भी दे दिया गया है। कोर्ट का कहना था कि यह राज्य सरकार का क्षेत्राधिकार है कि वह अपने किस कर्मचारी से कौन सा काम लेना चाहती है। अदालत इस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।
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कोर्ट ने कहा कि यह नियोक्ता का कार्य है कि वह किससे कौन सा काम लेना चाहता है। अदालत इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगी। आरोपी चीफ इंजीनियर के खिलाफ चार्जशीट पहले ही दाखिल हो चुकी है। प्रयागराज के भाजपा कार्यकर्ता दिवाकर त्रिपाठी की जनहित याचिका पर मुख्य न्यायमूर्ति गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति एसडी सिंह की पीठ ने सुनवाई की।
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याचिका में मांग की गई थी कि वर्तमान में आरोपी चीफ इंजीनियर को प्रयागराज लोक निर्माण विभाग में पोस्टिंग दी गई है। इनको यहां से हटाया जाए। ताकि उनके खिलाफ निष्पक्ष जांच हो सके। कोर्ट को बताया गया कि आरोपी चीफ इंजीनियर के खिलाफ विभागीय जांच चल रही है।
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उनको चार्जशीट भी दी गई है। इसके बावजूद न सिर्फ उनको प्रयागराज में नियुक्ति दी गई बल्कि कौशांबी का अतिरिक्त प्रभार भी दे दिया गया है। कोर्ट का कहना था कि यह राज्य सरकार का क्षेत्राधिकार है कि वह अपने किस कर्मचारी से कौन सा काम लेना चाहती है। अदालत इस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।