{"_id":"5ecf82a78ebc3e85b54f8202","slug":"high-court171","type":"story","status":"publish","title_hn":"मारपीट में मौत के मामले में मिली उम्रकैद की सजा को हाईकोर्ट ने किया रद्द, अभियुक्त को रिहा करने का आदेश","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मारपीट में मौत के मामले में मिली उम्रकैद की सजा को हाईकोर्ट ने किया रद्द, अभियुक्त को रिहा करने का आदेश
Thu, 28 May 2020 02:51 PM IST
अमर उजाला लोकल ब्यूरो
news desk amar ujala, prayagraj
news desk amar ujala, prayagraj
Published by: अमर उजाला लोकल ब्यूरो
Updated Thu, 28 May 2020 02:51 PM IST
विज्ञापन
हाईकोर्ट, अदालत, न्यायालय
- फोटो : file photo
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि आपसी झगड़े में हुई मारपीट से हुई मौत हत्या नहीं है। इसे मानव वध माना जाएगा। कोर्ट ने हत्या के आरोप में सत्र न्यायालय द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया है और हत्या को मानव वध करार देते हुए 11 साल 11 माह तक जेल में व्यतीत किए गए समय को सजा के लिए पर्याप्त माना है।
कोर्ट ने आरोपी अलीगढ़ के श्रवण की तत्काल रिहाई का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि आरोपी रिहा होने के तीन माह के भीतर 50 हजार रुपये बतौर मुआवजा कोर्ट में जमा करे । जिसे मृतक के माता-पिता को दिया जाए। यह फैसला न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर तथा न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव की खंडपीठ ने अलीगढ़ के श्रवण की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दिया है।
वादी मुकदमा रानी ने सात मार्च 2008 को प्राथमिकी दर्ज कराई थी। जिसमे आरोप लगाया कि उसका बेटा संतोष छह मार्च को रात साढ़े दस बजे बिजली की मरम्मत कर रहा था। आरोपी की दीवार पर होने के कारण राजू से उसका झगड़ा हुआ। राजू ने संतोष को पकड़ लिया और श्रवण ने चाकू से हमला किया। शिकायतकर्ता मां ,उसके पति व देवर के पहुचने पर आरोपीगण भाग गये।
विज्ञापन
अस्पताल में डाक्टर ने संतोष को मृत घोषित कर दिया। पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और अपर सत्र न्यायाधीश अलीगढ़ ने श्रवण को हत्या का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जिसे अपील में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि घटना के चश्मदीद गवाह हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट मे मौत का कारण हैमरेज व शॉक बताया गया है।
यह साक्ष्य नहीं है कि हत्या की योजना थी। अचानक झगड़ा हुआ और जिसके चलते मौत हो गई। इसे हत्या नहीं कहा जा सकता है। आरोपी मानव वध का दोषी है। कोर्ट ने काटी सजा को पर्याप्त माना और मुआवजा देने का आदेश देते हुए रिहा करने का निर्देश दिया है।
विज्ञापन
कोर्ट ने आरोपी अलीगढ़ के श्रवण की तत्काल रिहाई का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि आरोपी रिहा होने के तीन माह के भीतर 50 हजार रुपये बतौर मुआवजा कोर्ट में जमा करे । जिसे मृतक के माता-पिता को दिया जाए। यह फैसला न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर तथा न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव की खंडपीठ ने अलीगढ़ के श्रवण की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दिया है।
विज्ञापन
वादी मुकदमा रानी ने सात मार्च 2008 को प्राथमिकी दर्ज कराई थी। जिसमे आरोप लगाया कि उसका बेटा संतोष छह मार्च को रात साढ़े दस बजे बिजली की मरम्मत कर रहा था। आरोपी की दीवार पर होने के कारण राजू से उसका झगड़ा हुआ। राजू ने संतोष को पकड़ लिया और श्रवण ने चाकू से हमला किया। शिकायतकर्ता मां ,उसके पति व देवर के पहुचने पर आरोपीगण भाग गये।
विज्ञापन
अस्पताल में डाक्टर ने संतोष को मृत घोषित कर दिया। पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और अपर सत्र न्यायाधीश अलीगढ़ ने श्रवण को हत्या का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जिसे अपील में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि घटना के चश्मदीद गवाह हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट मे मौत का कारण हैमरेज व शॉक बताया गया है।
यह साक्ष्य नहीं है कि हत्या की योजना थी। अचानक झगड़ा हुआ और जिसके चलते मौत हो गई। इसे हत्या नहीं कहा जा सकता है। आरोपी मानव वध का दोषी है। कोर्ट ने काटी सजा को पर्याप्त माना और मुआवजा देने का आदेश देते हुए रिहा करने का निर्देश दिया है।