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High Court : चुनाव मुकदमों में समय सीमा के बाहर दाखिल अर्जी स्वीकार योग्य नहीं, पार्षद को बड़ी राहत

Fri, 18 Apr 2025 12:34 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 18 Apr 2025 12:34 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद के ज्ञानखंड इंदिरापुरम वार्ड नंबर 87 के विजयी पार्षद को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने विजयी पार्षद के खिलाफ चुनावी मुकदमे में ट्रायल कोर्ट द्वारा एक संशोधन अर्जी पर पारित आदेश को रद्द कर दिया है।

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High Court: Petition filed outside the time limit in election cases is not acceptable
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद के ज्ञानखंड इंदिरापुरम वार्ड नंबर 87 के विजयी पार्षद को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने विजयी पार्षद के खिलाफ चुनावी मुकदमे में ट्रायल कोर्ट द्वारा एक संशोधन अर्जी पर पारित आदेश को रद्द कर दिया है और कहा है कि संशोधन अर्जी समय सीमा समाप्त होने के बाद दाखिल की गई है। लिहाजा, उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है। यह आदेश यह आदेश न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने विजयी पार्षद अनुज त्यागी की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। याचिका पर पंकज त्यागी और डॉ. आकाश त्यागी ने बहस की। 

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ट्रायल कोर्ट में याची के निर्वाचन को चुनौती दी गई है। कहा गया है कि याची ने अपने चुनावी हलफनामे में सही तथ्य नहीं बताए हैं। चुनाव परिणाम 13 मई 2023 को आया था और याची ने उसमें विजय हासिल की थी। इस चुनाव में हिस्सा लेने वाले सिद्धी प्रधान अग्रवाल ने ट्रायल कोर्ट में चुनावी मुकदमा दाखिल किया। मूल मुकदमें में उन्होंने विजयी प्रत्याशी यानी याची के अलावा अन्य पांच उम्मीदवारों को पक्षकार नहीं बनाया। उन्होंने अन्य उम्मीदवारों को पक्षकार बनाने के लिए 30 दिन की समय सीमा से अधिक समय बीत जाने के बाद अर्जी दाखिल की। ट्रायल कोर्ट ने उस अर्जी को स्वीकार कर लिया।
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याची ने पुनर्विचार अर्जी दाखिल की लेकिन ट्रायल कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया। उसके बाद याची ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने संशोधन अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि चुनावी मुकदमों में दाखिल होने वाली अर्जियां समय सीमा के भीतर होना जरूरी हैं। अगर वह समय सीमा से परे दाखिल होती हैं तो वह संशोधन अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन होगा और ऐसी अर्जी स्वीकार योग्य नहीं है।

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