{"_id":"6266f9877dc346612f3698d8","slug":"high-court-officers-can-continue-investigation-even-after-filing-of-charge-sheet-in-cognizable-offenses","type":"story","status":"publish","title_hn":"हाईकोर्ट : संज्ञेय अपराधों में आरोप पत्र दाखिल होने के बाद भी जांच जारी रख सकते हैं अधिकारी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हाईकोर्ट : संज्ञेय अपराधों में आरोप पत्र दाखिल होने के बाद भी जांच जारी रख सकते हैं अधिकारी
Tue, 26 Apr 2022 01:11 AM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Tue, 26 Apr 2022 01:11 AM IST
सार
मामले में याची के खिलाफ आगरा जिले के सिकंदरा थाने में लूट के मामले में आईपीसी की धारा 392 और 411 के तहत नौ मार्च 2019 में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। याची का कहना था कि उसका नाम आरोपी के रूप में नहीं था।
विज्ञापन
इलाहाबाद हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि संज्ञेय अपराधों में एक आर आरोप पत्र दाखिल होने के बाद भी पुलिस अधिकारी जांच को आगे जारी रख सकते हैं। जांच को आगे जारी रखने में पुलिस अधिकारी को मजिस्ट्रेट के आदेश की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 173(2) में इसकी व्यवस्था की गई है। जांच को आगे जारी रखा जा सकता है। यह आदेश न्यायमूर्ति अंजनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति दीपक वर्मा की खंडपीठ ने सुबोध कुमार जैन उर्फ सुबोध जैन की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
विज्ञापन
मामले में याची के खिलाफ आगरा जिले के सिकंदरा थाने में लूट के मामले में आईपीसी की धारा 392 और 411 के तहत नौ मार्च 2019 में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। याची का कहना था कि उसका नाम आरोपी के रूप में नहीं था। शुरू में पुलिस द्वारा दाखिल आरोप पत्र में चार लोगों पर आरोप लगाए गए थे। मामले में पुलिस ने अपनी जांच आगे जारी रखी और याची के आवास पर पहुंच गई। इसके खिलाफ याची ने जिला न्यायालय में अर्जी दाखिल की, जिस पर सत्र न्यायालय ने पुलिस से जानकारी मांगी।
विज्ञापन
पुलिस की ओर से प्रस्तुत रिपोर्ट में याची को वांछित बताया गया। इसके बाद याची ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। याची की ओर से तर्क दिया गया कि जब एक बार आरोप पत्र का संज्ञान ले लिया गया तो जांच समाप्त हो गई। इसके बाद पुलिस बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के आगे की जांच नहीं कर सकती है।
विज्ञापन
जवाब में सरकारी अधिवक्ता ने कहा कि अनुमति मांगने की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि, सीआरपीसी की धारा 173(2) के तहत पुलिस केपास जांच केलिए असीमित शक्तियां हैं। आरोपपत्र दाखिल होने केबाद भी जांच कर सकती है। इसके अलावा पुलिस 156 (1) के तहत भी जांच जारी रख सकता है। हालांकि, असंज्ञेय मामलों ऐसा नहीं है।