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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   High Court: Magistrate is not bound to order FIR in every case under Section 175 (3) of BNSS.

High Court : बीएनएसएस की धारा-175 तीन के तहत मजिस्ट्रेट हर मामले में एफआईआर का आदेश देने के लिए बाध्य नहीं

Sat, 14 Feb 2026 11:54 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 14 Feb 2026 11:54 AM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा-175(3) के तहत आवेदन मिलने पर मजिस्ट्रेट प्रत्येक मामले में एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने के लिए बाध्य नहीं है।

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High Court: Magistrate is not bound to order FIR in every case under Section 175 (3) of BNSS.
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा-175(3) के तहत आवेदन मिलने पर मजिस्ट्रेट प्रत्येक मामले में एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने के लिए बाध्य नहीं है। वह अपने न्यायिक विवेकानुसार ऐसे आवेदन को शिकायत के रूप में भी दर्ज कर सकता है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला की एकल पीठ ने प्रदीप कुमार की याचिका खारिज कर दी।

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कानुपर देहात निवासी याची प्रदीप कुमार ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) के समक्ष बीएनएसएस की धारा-175(3) के तहत आवेदन दायर किया था। आरोप लगाया था कि उनके भाई संदीप पर जानलेवा हमला किया गया। साथ ही पैर कांटेदार तार से बांधकर बाइक से उसे घसीटा गया, जिससे पैर कट गया था। शिकायत के बाद भी पुलिस ने कार्रवाई नहीं की तो मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन किया। सीजेएम कानपुर देहात ने आवेदन को एफआईआर के बजाय शिकायत के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया तो उन्होंने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

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175-3 काफी हद तक 156-3 के समान, पुराने नियम ही होंगे लागू

कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद माना कि बीएनएसएस की धारा-175(3) के प्रावधान काफी हद तक पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-156(3) के समान हैं। इसलिए पूर्व में स्थापित कानूनी सिद्धांत नए पर भी लागू होंगे। आवेदन में ऐसे किसी साक्ष्य की आवश्यकता नहीं दिखती, जिसे केवल पुलिस जांच के जरिये ही जुटाया जा सकता हो तो मजिस्ट्रेट उसे शिकायत के रूप में मान सकता है। पुलिस जांच का आदेश तब दिया जाना चाहिए, जब अभियुक्तों का विवरण ज्ञात न हो, बरामदगी की आवश्यकता हो या साक्ष्य एकत्र करने के लिए वैज्ञानिक जांच की जरूरत हो।

हाईकोर्ट ने पाया कि मामले में याची को घटना के तथ्यों की पूरी जानकारी है। वह अपने साक्ष्य स्वयं न्यायालय में प्रस्तुत कर सकता है। साथ ही घटना के काफी समय बीतने के कारण अब मौके से भौतिक साक्ष्य (जैसे खून से सनी मिट्टी) मिलना संभव नहीं है। ऐसे में कोर्ट ने इन आधारों पर मजिस्ट्रेट के आवेदन को शिकायत के रूप में दर्ज करने के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।

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