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High Court : झूठी इत्तिला के खिलाफ कार्यवाही से पहले दंड प्रक्रिया संहिता के प्रविधानों का पालन अनिवार्य

Sat, 02 Dec 2023 12:38 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 02 Dec 2023 12:38 PM IST
सार

मामला बरेली का है। ग्राम पंचायत पिलपलसाना के ग्राम पंचायत सचिव और पंचायत सहायक के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने के लिए सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत बरेली की भ्रष्टाचार निरोधी विशेष अदालत में अर्जी दाखिल की।

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High Court: It is mandatory to follow the provisions of the Indian Penal Code before taking action
अदालत। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली के विशेष न्यायाधीश द्वारा याची के खिलाफ झूठी इत्तिला देने के अपराध के लिए दंडित करने के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 182 की कार्यवाही शुरू हुई कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा की ऐसी कार्यवाही तब तक शून्य होगी जब तक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 के तहत निर्धारित प्रक्रिया पूर्ण नही की जाती। यह फैसला न्यायमूर्ति राजबीर सिंह की अदालत ने याची गौतम घियार की ओर से दाखिल पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सुनाया।

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मामला बरेली का है। ग्राम पंचायत पिलपलसाना के ग्राम पंचायत सचिव और पंचायत सहायक के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने के लिए सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत बरेली की भ्रष्टाचार निरोधी विशेष अदालत में अर्जी दाखिल की। आरोप लगाया कि मां का मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाने के लिए दोनो पंचायत कर्मियों ने उससे पहले पांच सौ रुपए लिए और फिर एक हजार रुपए की मांग करने लगे। रुपए देने से मना करने पर उसे जातिसूचक गलियां दी।

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निचली अदालत ने याची की अर्जी खारिज कर दिया। साथ ही याची द्वारा पंचायतकर्मियो के खिलाफ लगाए गए आरोप को झूठा मानते हुए उसे मिथ्या इत्तिला देने के अपराध के लिए आईपीसी की धारा 182 के तहत दंडित करने की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश पारित कर दिया।

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याची ने इस आदेश को हाईकोर्ट ने चुनौती दी। कोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए याची के खिलाफ शुरू की गई 182 की कार्यवाही को रद्द कर दिया जबकि निचली अदालत द्वारा 156 (3) की अर्जी खारिज करने के आदेश पर हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया।
 

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दौलतराम मामले में निर्धारित विधि व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा कि सीआरपीसी की धारा 195 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन न किए जाने के कारण याची के खिलाफ शुरू की गई 182 की कार्यवाही अवैधानिक होने के साथ ही शून्य भी है। जबकि, 156(3) की अर्जी पर विवेचना करना या न करना निचली अदालत का विवेकाधीन शक्तियों का विषय है। निचली अदालत को एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

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