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हाईकोर्टः कोरोना के मद्देनजर छह अप्रैल तक नागरिकों से वसूली, नीलामी पर रोक
Wed, 18 Mar 2020 07:09 PM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Wed, 18 Mar 2020 07:09 PM IST
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इलाहाबाद हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
कोरोना का संक्रमण रोकने के लिए किए जा परे उपायों की वजह से आम जनता को कोई परेशानी न हो, इसके मद्देनजर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अगले दो सप्ताह यानि छह अप्रैल 2020 तक सभी बैंकों, वित्तीय संस्थाओं और सरकारी संस्थाओं की ओर से किसी भी प्रकार की वसूली कार्रवाई पर रोक लगा दी है ।
कोर्ट ने कहा है कि कोई भी नीलामी प्रक्रिया इस दौरान नहीं होगी। किसी के भी मकान का ध्वस्तीकरण नहीं किया जाएगा, न ही किसी को भी उसके मकान से बेदखल किया जाएगा ।
जिला प्रशासन एवं अर्द्धंन्यायिक संस्थाएं किसी भी अधिकारी को पेशी के लिए तलब नहीं करेंगी । कोर्ट ने यह कदम कोरोना वायरस की भयावहता को देखते हुए दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा तथा न्यायमूर्ति अजीत कुमार की खंडपीठ ने दर्पन साहू की बैंक वसूली के खिलाफ दाखिल याचिका की सुनवाई के बाद दिया है।
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कोर्ट ने राज्य सरकार व सभी वित्तीय संस्थाओं, अधिकारियों को अगले दो सप्ताह तक वसूली मामले में व्यक्तिगत उत्पीड़न नहीं करने का भी निर्देश दिया है। कोर्ट का मानना है कि इस प्रकार की कार्रवाई की वजह से लोग अदालत की शरण में आने को विवश होते हैं तथा निजी तौर पर उनकी परेशानी बढ़ती है। इन हालात में किसी को विवश नहीं किया जाएगा कि उसे कोर्ट की शरण में आना पड़े।
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कोर्ट ने कहा है कि कोई भी नीलामी प्रक्रिया इस दौरान नहीं होगी। किसी के भी मकान का ध्वस्तीकरण नहीं किया जाएगा, न ही किसी को भी उसके मकान से बेदखल किया जाएगा ।
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जिला प्रशासन एवं अर्द्धंन्यायिक संस्थाएं किसी भी अधिकारी को पेशी के लिए तलब नहीं करेंगी । कोर्ट ने यह कदम कोरोना वायरस की भयावहता को देखते हुए दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा तथा न्यायमूर्ति अजीत कुमार की खंडपीठ ने दर्पन साहू की बैंक वसूली के खिलाफ दाखिल याचिका की सुनवाई के बाद दिया है।
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कोर्ट ने राज्य सरकार व सभी वित्तीय संस्थाओं, अधिकारियों को अगले दो सप्ताह तक वसूली मामले में व्यक्तिगत उत्पीड़न नहीं करने का भी निर्देश दिया है। कोर्ट का मानना है कि इस प्रकार की कार्रवाई की वजह से लोग अदालत की शरण में आने को विवश होते हैं तथा निजी तौर पर उनकी परेशानी बढ़ती है। इन हालात में किसी को विवश नहीं किया जाएगा कि उसे कोर्ट की शरण में आना पड़े।