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UP : हाईकोर्ट ने जताई आपत्ति- कहा- ट्रायल कोर्ट हिंदी या अंग्रेजी में लिखें फैसले, न हो दोनों का मिश्रण

Sat, 15 Nov 2025 11:25 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 15 Nov 2025 11:25 AM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परीक्षण न्यायालयों (ट्रायल कोर्ट) के फैसलों में हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित भाषा के प्रयोग पर आपत्ति जताई है। कोर्ट ने कहा है कि फैसले पूरी तरह से हिंदी या अंग्रेजी में हों। मिश्रित भाषा में फैसले लिखना पूरी तरह से गलत और अस्वीकार्य है।

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High Court expressed objection - said- Trial court should write the decisions in Hindi or English
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परीक्षण न्यायालयों (ट्रायल कोर्ट) के फैसलों में हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित भाषा के प्रयोग पर आपत्ति जताई है। कोर्ट ने कहा है कि फैसले पूरी तरह से हिंदी या अंग्रेजी में हों। मिश्रित भाषा में फैसले लिखना पूरी तरह से गलत और अस्वीकार्य है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा और न्यायमूर्ति अजय कुमार द्वितीय की खंडपीठ ने आगरा की सत्र अदालत के 54 पन्नों के फैसले को अवांछनीय परंपरा का अभूतपूर्व उदाहरण बताया। साथ ही इस आदेश की प्रति मुख्य न्यायाधीश को भेजने और प्रदेश के सभी न्यायिक अधिकारियों को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।

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कोर्ट ने कहा, हिंदी भाषी राज्य में फैसलों को हिंदी में लिखने का उद्देश्य यह है कि सामान्य वादी-प्रतिवादी भी अदालत की बात और उसके तर्क को समझ सके। यदि निर्णय का आधा हिस्सा अंग्रेजी और आधा हिंदी में होगा तो आम हिंदी भाषी व्यक्ति फैसले का अभिप्राय समझ नहीं पाएगा। अदालत ने पाया कि संबंधित फैसले में 199 पैरा में से 63 अंग्रेजी, 125 हिंदी और 11 में दोनों भाषाओं के मिले-जुले शब्द थे।

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कुछ पैरा तो ऐसे थे जिनमें आधा वाक्य हिंदी और आधा अंग्रेजी में लिखा गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि निर्णय हिंदी में लिखा जा रहा हो तो उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट के अंग्रेजी उद्धरण को कोट करना उचित है लेकिन इसका हिंदी अनुवाद भी जरूर दिया जाए। वहीं अंग्रेजी भाषा में लिखे निर्णय में हिंदी में दर्ज मरने से पहले के बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) को जस का तस लिखा जा सकता है।

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यह है मामला

मामला आगरा के बरहन थाना क्षेत्र का है। ट्रायल कोर्ट ने 2021 में दहेज हत्या के मामले में पति रवि को बेगुनाह करार देते हुए बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ मृतका अंकिता के पिता वेद प्रकाश त्यागी ने हाईकोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि मृतका की मौत विवाह के सात वर्ष के भीतर जरूर हुई थी और विषाक्तता से हुई थी लेकिन दहेज की मांग से जुड़ीं क्रूरताओं का कोई ठोस प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं आया।

गवाहों के बयान भी परस्पर विरोधी पाए गए। साथ ही पति द्वारा पत्नी को अस्पताल ले जाना, खर्च वहन करना और अंतिम संस्कार करना उसके सद्भावपूर्ण आचरण को दर्शाता है। साक्ष्यों के अनुसार अभियोजन मृत्यु से ठीक पहले क्रूरता या उत्पीड़न साबित करने में विफल रहा। इसलिए दहेज हत्या की परिकल्पना का सिद्धांत भी मौजूदा मामले में लागू नहीं होता। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस फैसले पर तो मुहर लगा दी लेकिन इसकी लिखावट पर आपत्ति जताई।

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