फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   High Court Delay in FIR without concrete reason gives rise to suspicion

High Court : बिना ठोस कारण एफआईआर में देरी संदेह को देती है जन्म, उम्रकैद पाए  तीन हत्यारोपियों की सजा रद्द

Sun, 22 Mar 2026 03:28 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 22 Mar 2026 03:28 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि रंजिश पुरानी हो तो बिना ठोस कारण एफआईआर में देरी संदेह को जन्म देती है। कानूनन आरोपी संदेह का लाभ पाने का हकदार होता है।

विज्ञापन
High Court Delay in FIR without concrete reason gives rise to suspicion
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि रंजिश पुरानी हो तो बिना ठोस कारण एफआईआर में देरी संदेह को जन्म देती है। कानूनन आरोपी संदेह का लाभ पाने का हकदार होता है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह प्रथम की खंडपीठ ने हत्यारोपी इरफान, फहीम और सलीम को मिली उम्रकैद से बरी कर दिया।

विज्ञापन


रामपुर की सत्र अदालत ने उन्हें दोषी करार देते हुए 2017 में सजा सुनाई थी। मामला रामपुर के भोट थाना क्षेत्र का है। आरोप लगा कि सात मार्च 2013 को मोहम्मद रफी की ट्रैक्टर से कुचलकर हत्या हुई थी। आरोप लगा कि रंजिश में फहीम ने इरफान और सलीम के उकसाने पर जानबूझकर रफी पर ट्रैक्टर चढ़ाया। रामपुर की सत्र अदालत ने 2017 में तीनों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ सभी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लंबी सुनवाई के बाद लिखे 46 पन्नों के फैसले में कोर्ट ने मुख्य रूप से तीन बिंदुओं को आरोपों में संदेह का आधार बनाया। इसी आधार पर सभी आरोपियों की सजा रद्द करते हुए रिहा करने का आदेश दिया। 

विज्ञापन

संदेह के तीन आधार

1. एफआईआर में 49 घंटे की देरी

कोर्ट ने पाया कि घटना सात मार्च को सुबह हुई, जबकि रिपोर्ट नौ मार्च को दर्ज कराई गई। कोर्ट ने इसे अत्यधिक देरी और अस्पष्ट आरोप माना।

2.दुर्घटना को दिया गया हत्या का रूप

मेडिकल रिकॉर्ड में कोर्ट ने पाया कि मृतक को शुरू में एक्सीडेंटल केस के रूप में अस्पताल लाया गया था। बाद में इसे सोची-समझी रणनीति के तहत हत्या का रंग दिया गया।

3. गवाहों के विरोधाभास

कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड में पाया कि कथित चश्मदीदों ने पहले कहा कि वे घायल को अस्पताल ले गए, लेकिन जिरह के दौरान उन्होंने स्वीकार किया कि वे मौके से 15 मिनट बाद ही चले गए थे।

अदालत की टिप्पणी

जब प्राथमिकी दर्ज करने में अकारण देरी होती है तो यह अभियोजन की कहानी में विचार-विमर्श और बनावटी तथ्यों को शामिल करने का अवसर प्रदान करती है। विशेषकर उन मामलों में जहां पक्षों के बीच पहले से रंजिश हो, वहां झूठे फंसाए जाने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। - इलाहाबाद हाईकोर्ट
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed