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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   High Court: Compensation is not a handout or an act of charity; it is a legal right.

High Court : : मुआवजा खैरात या दया की भीख नहीं, कानूनी अधिकार है

Mon, 24 Aug 2026 05:45 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 24 Aug 2026 05:45 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र किया। कहा कि सड़क हादसे के मामलों में मुआवजा कोई खैरात या दया की भीख नहीं, कानूनी अधिकारों के तहत मिलने वाली न्यायसंगत क्षतिपूर्ति है।

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High Court: Compensation is not a handout or an act of charity; it is a legal right.
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र किया। कहा कि सड़क हादसे के मामलों में मुआवजा कोई खैरात या दया की भीख नहीं, कानूनी अधिकारों के तहत मिलने वाली न्यायसंगत क्षतिपूर्ति है। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण गाजियाबाद के फैसले में संशोधन कर पीड़ित का मुआवजा 15.28 लाख से बढ़ाकर 28.84 लाख कर दिया है।

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यह आदेश न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की एकल पीठ ने मुजाहिद की प्रथम अपील पर दिया है। गाजियाबाद निवासी याची मुजफ्फरनगर में नवंबर 2007 को सड़क हादसे में घायल हो गए थे। उनकी रीढ़ की हड्डी टूटने से चल नहीं पा रहा था। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने सीएमओ के 70 प्रतिशत दिव्यांगता प्रमाणपत्र के आधार पर मुआवजा तय किया था। याची ने मुआवजा राशि बढ़ाने की मांग में अपील दायर की।
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कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। कहा कि जब कोई व्यक्ति स्थायी रूप से बिस्तर पर आ जाता है और रोजमर्रा के कामों के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है। ऐसे में उसकी कमाने की क्षमता का नुकसान 100 प्रतिशत माना जाएगा। भले ही दिव्यांगता 70 प्रतिशत दर्ज हो। उसकी कार्यात्मक दिव्यांगता 100 प्रतिशत ही मानी जाएगी।

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कोर्ट ने मेडिकल बिल पेश न कर पाने के आधार पर इलाज का खर्च खारिज करने के अधिकरण के रवैये को अनुचित बताया। कोर्ट ने 116 दिनों के लंबे अस्पताल प्रवास और रीढ़ की हड्डी में स्टील प्लेट व स्क्रू लगाने की सर्जरी को देखते हुए 2.50 लाख का चिकित्सा खर्च स्वीकृत किया। साथ ही भविष्य की संभावनाओं के तहत 50 प्रतिशत बढ़ोतरी, अटेंडेंट शुल्क के रूप में 8.64 लाख रुपये और विवाह की संभावनाओं के नुकसान के लिए एक लाख रुपये की राशि जोड़ी गई। कोर्ट ने आदेश दिया कि संशोधित कुल राशि 28,84,000 पर याचिका दायर करने की तिथि से सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा। यह भुगतान वाहन स्वामी और न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी की ओर से 50-50 प्रतिशत के अनुपात में एक महीने के भीतर किया जाएगा। 

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