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UP : न्यायिक मजिस्ट्रेट के खिलाफ हाईकोर्ट ने रद्द किया दंडात्मक आदेश, महिला ने लगाया था संबंध बनाने का आरोप

Thu, 30 May 2024 01:10 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 30 May 2024 01:10 PM IST
सार

मामले में याचिकाकर्ता का चयन सिविल जज में चयन हुआ था और पहली नियुक्ति मऊ जिले में न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में हुई। इस दौरान प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले कई अभ्यर्थी फेसबुक के माध्यम से याची से जुड़े। लखनऊ निवासी 25 वर्षीय महिला भी फेसबुक के माध्यम से दोस्त बनी।

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High Court canceled the penal order against the judicial magistrate, the woman had accused of having an affair
अदालत। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेट की याचिका पर सुनवाई करते हुए रजिस्ट्रार जनरल के दंडात्मक आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारी के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई में अनियमितताएं हैं। ऐसे में अधिकारी के 2018 से वेतन वृद्धि रोकने का आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन है। यह आदेश न्यायमित्र सौमित्र दयाल सिंह व न्यायमूर्ति डी रमेश की पीठ ने सुनवाई करते हुए दिया।

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मामले में याचिकाकर्ता का चयन सिविल जज में चयन हुआ था और पहली नियुक्ति मऊ जिले में न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में हुई। इस दौरान प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले कई अभ्यर्थी फेसबुक के माध्यम से याची से जुड़े। लखनऊ निवासी 25 वर्षीय महिला भी फेसबुक के माध्यम से दोस्त बनी। महिला ने न्यायिक मजिस्ट्रेट पर आरोप लगाया कि शादी का झूठा वादा करके उसके साथ संबंध बनाए। इसका विरोध किया, तो जान से मारने की धमकी दी।
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महिला ने इस संबंध में जिला जज मऊ से शिकायत की। रजिस्ट्रार जनरल, हाईकोर्ट ने इस मामले में जिला जज मऊ को जांच अधिकारी नियुक्त किया। महिला अपना बयान दर्ज कराने नहीं पहुंची। जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें न्यायिक मजिस्ट्रेट को मुख्य आरोप से मुक्त कर दिया। साथ ही टिप्पणी की कि अज्ञात महिला से फेसबुक फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार करना और उसके साथ कुछ आपत्तिजनक तस्वीरें दिखाते हुए बातचीत करना। महिला के बैंक खाते में रुपये का भुगतान करना न्यायिक मानदंडों के खिलाफ है। रिपोर्ट के आधार पर रजिस्ट्रार जनरल ने 2018 से वेतन वृद्धि रोकने का आदेश दिया। इसके विरोध में हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।
 

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध लगाए गए प्राथमिक आरोप सिद्ध नहीं हुए। जांच रिपोर्ट में दोषमुक्त करने का स्पष्ट उल्लेख है। ऐसे में जब तक कि शिकायतकर्ता उपस्थित होकर अपनी शिकायत को सिद्ध नहीं कर देती तब तक याची के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी करना उचित नहीं। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 13 मई 2022 का विवादित दंड आदेश को रद्द कर दिया।

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