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High Court : न कंपनी भारतीय और न ही याचिकाकर्ता, ऐसे में देश के कानून की भूमिका व बैंक की जिम्मेदारी स्पष्ट हो

Thu, 18 Dec 2025 06:14 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 18 Dec 2025 06:14 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विदेशी कंपनी को दिए गए 55 करोड़ रुपये कर्ज के मामले में बैंक ऑफ बड़ौदा और केंद्र सरकार से गंभीर सवाल पूछा है। कोर्ट ने कहा कि जब पूरा लेनदेन विदेश में हुआ है तो भारतीय कानून की भूमिका और बैंक की जिम्मेदारी को स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।

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High Court: Banks should explain... if the property is not here
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विदेशी कंपनी को दिए गए 55 करोड़ रुपये कर्ज के मामले में बैंक ऑफ बड़ौदा और केंद्र सरकार से गंभीर सवाल किए हैं। न्यायालय ने कहा कि जब पूरा लेनदेन विदेश में हुआ है तो भारतीय कानून की भूमिका और बैंक की जिम्मेदारी स्पष्ट होनी जरूरी है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अनिश कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने ऑस्ट्रेलियाई नागरिक मोहम्मद फारूक की याचिका पर की।

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मोहम्मद फारूक ने यूएई स्थित कंपनी एमएस फारलिन टिंबर्स के लिए गारंटर के रूप में बैंक ऑफ बड़ौदा को दुबई स्थित एक वेयरहाउस गिरवी रखा था। इसके एवज में कंपनी को करीब 55 करोड़ रुपये का ऋण मिला। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला पूरी तरह विदेशी भूमि से जुड़ा प्रतीत होता है। इसमें न तो संबंधित कंपनी भारतीय है और न ही याचिकाकर्ता यहां का नागरिक है। ऐसे में भारतीय कानून की उपयोगिता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
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कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि गिरवी रखे गए वेयरहाउस को दुबई में बेच दिया गया है लेकिन उससे पूरा कर्ज नहीं चुका। वहीं, बैंक ने एक आरोप यह भी लगाया कि गारंटी के समय दिया गया एक खाली चेक दुबई में बाउंस हो गया, जिसे लेकर वहां आपराधिक कार्यवाही लंबित है। बैंक के मुताबिक मूलधन और ब्याज मिलाकर अब बकाया राशि 104 करोड़ रुपये से अधिक हो चुकी है।

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कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को अगली सुनवाई पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के उन दिशानिर्देशों को प्रस्तुत करने कहा है जिनके तहत विदेशी कंपनी को विदेश में ऋण दिया जाता है और विदेशी नागरिक से गिरवी संपत्ति ली जाती है।

सुनवाई के दौरान बैंक ऑफ बड़ौदा के अधिवक्ता ने कोर्ट से समय मांगा। इसे स्वीकार करते हुए कोर्ट ने अगली सुनवाई पर यह स्पष्ट करने को कहा कि दुबई स्थित गिरवी वेयरहाउस का मूल्यांकन क्या था और इसे किस कीमत पर बेचा गया। साथ ही बिक्री के बावजूद पूरा ऋण क्यों नहीं वसूला जा सका। कोर्ट ने यह भी पूछा है कि वेयरहाउस का खरीदार कौन है। कोर्ट ने मामले को जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में दोपहर 2 बजे पुनः सूचीबद्ध करने का आदेश दिया।

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