UP : हाईकोर्ट ने नसीहत - अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों पर टिप्पणी करने में संयम बरते उच्च अदालतें
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपीलीय न्यायालय को अधीनस्थ न्यायालय पर अपमानजनक टिप्पणी न करने की नसीहत दी है। कहा कि अपीलीय न्यायालय को शक्तियां अधीनस्थ अदालत की विधिक त्रुटियों को सुधारने के लिए दी गईं हैं न कि अनावश्यक टिप्पणी करने के लिए।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपीलीय न्यायालय को अधीनस्थ न्यायालय पर अपमानजनक टिप्पणी न करने की नसीहत दी है। कहा कि अपीलीय न्यायालय को शक्तियां अधीनस्थ अदालत की विधिक त्रुटियों को सुधारने के लिए दी गईं हैं न कि अनावश्यक टिप्पणी करने के लिए। लिहाजा, अपीलीय शक्तियों का प्रयोग करते हुए न्यायालयों को अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध तीखी या अपमानजनक टिप्पणियां दर्ज करने में अत्यंत सावधानी और संयम बरतना चाहिए।
इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की अदालत ने शामली जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष हेमंत कुमार गुप्ता के खिलाफ अपीलीय न्यायालय की ओर से की गई टिप्पणी को निरस्त कर दिया। मामले के मुताबिक याची उपभोक्ता आयोग शामली के अध्यक्ष हैं। उनके दिए गए दो निर्णयों में अपीलीय अदालत ने प्रतिकूल टिप्पणियां दर्ज कीं। इसके खिलाफ उन्होंने पहले राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग और फिर हाईकोर्ट का रुख किया है।
कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि न्यायालयों के पास स्वतंत्र निर्णय देने की शक्ति अवश्य है, परंतु न्याय के समुचित प्रशासन के लिए यह आवश्यक है कि किसी भी व्यक्ति या प्राधिकारी के आचरण पर टिप्पणी तभी की जाए जब वह मामले के निर्णय के लिए नितांत आवश्यक हो। न्यायालय ने कहा कि जज भी “हाड़-मांस के बने नश्वर प्राणी” हैं, इसलिए उन्हें न्यायिक संयम बनाए रखना चाहिए। इस संदर्भ में कोर्ट ने अमेरिकी न्यायाधीश फेलिक्स फ्रैंकफर्टर के विचारों का हवाला दिया कहा "विनम्रता, निःस्वार्थता और नीति व इतिहास के आलोक में सर्वोत्तम निर्णय तक पहुंचने का प्रयास न्यायाधीश का मूल कर्तव्य है।"
सुनवाई का अवसर दिए बिना टिप्पणी करना अनुचित
हाईकोर्ट ने बृज किशोर ठाकुर बनाम भारत संघ और के न्यायिक अधिकारी मामलों का हवाला देते हुए कहा कि उच्च न्यायालयों का उद्देश्य निचली अदालतों की त्रुटियों को सुधारना है, न कि उन पर कठोर टिप्पणी करना। साथ ही अवनी कुमार उपाध्याय बनाम इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध उसके आचरण पर टिप्पणी करने से पूर्व उसे सुनवाई का अवसर दिया जाना आवश्यक है। न्यायालय ने पाया कि इस मामले में ऐसा अवसर नहीं दिया गया था, इसलिए याचिका स्वीकार कर ली गई और अपमानजनक टिप्पणियों को निरस्त कर दिया गया।