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घरों में कैद हुईं शाहों और अंजुमनों की टोलियां

Tue, 28 Apr 2020 12:36 AM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Tue, 28 Apr 2020 12:36 AM IST
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groups of shahs and anjumans imprisoned in homes
कोरोना वायरस के प्रकोप ने रस्मों-रवायतों पर भी असर डाल दिया है। इस बार केरमजान में कोरोना के खौफ की वजह से सहरी के वक्त लोगों को जगाने की ऐसी ही परंपरा टूट गई है। यह पहला मौका है जब रोजेदारों को जगाने के लिए मुस्लिम बाहुल्य इलाकों की गलियों में अंजुमनों और शाहों की टोलियों की आवाज नहीं गूंज रही है। सहरी के लिए घर-घर लोगों को नींद से जगाने वाली अंजुमनों की वो टोलियां अब उन्हीं गलियों में गुम हैं। दुआओं के लिए दी जाने वाली उनकी दस्तक और लगाए जाने वाले नारे अब गुजरे जमाने की दास्तां हो गए हैं।
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रमजान का महीना मुसलमानों के लिए अहम तो है ही, यह पाक माह नसीहत और बरकत वाला भी माना जाता है। इस महीने में रोजे की सबसे अहम कड़ी की शुरुआत सहरी से होती है। और फिर इफ्तार की रवायत है। पुराने दौर से ही सहरी में लोगों को जगाने यानी नींद से बेजार करने की परंपरा रही है। पहले इसके लिए भोर में ही शाहों और अंजुमनों की टोलियां निकल जाया करती थीं। यह टोलियां नारे लगाते हुए समूहों में चलती थीं। उनका यह नारा रहता था- उठो हे रोजेदारों सहरी का वक्त आया है...। सहरी करके अपने रोजे की शुरुआत करो और हमको भी दुआओं में याद रखो। शाहों की टोलियां रोजेदारों को जगाकर अपने लिए भी अल्लाह की दुआओं में याद रखने की गुजारिश करते थे। इन टोलियों की आवाज सुनकर जागने वाले राजोदार उनको दक्षिणा भी दिया करते थे। कुछ इलाकों में लोग लाउडस्पीकर के जरिए भी सहरी के लिए लोगों को जगाते रहे हैं, लेकिन इस बार देशव्यापी लॉक डाउन में तस्वीर बदली हुई है। हर तरफ सन्नाटा है। घरों से बा-जमात निकलने पर पूरी तरह रोक है। इस वजह से न तो शाहों की टोलियां निकल रही हैं ना अंजुमनें। छतों पर लाउडस्पीकर लगाकर घरो में सहरी से एक घंटा पहले रोजेदारों को जगाने का सिलसिला भी ठप है। सड़कें सूनी और गलियां सूनी रह जा रही हैं। कोरोना की वजह से रमजान में इस सन्नाटे केबीच लोग इस बला को टालने और खत्म करने का लिए दुआएं कर रहे हैं। बुजुर्गों का कहना है की पुरानी परंपरा को याद करके आंखें भर आती हैं। करेली के अब्दुल सलाम कहते हैं कि पहले रात भर जागने और गलियों में इबादत करने की बात ही कुछ और थी। इस बार सब उजड़ा सा लग रहा है।
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सहरी के वक्त को लेकर ताकीद करने में जुट जाते थे। मस्जिदों से लेकर घरों तक का माहौल तो बदल ही जाता था, साथ ही अकीदत का माहौल बन जाता था। लेकिन इस बार यह परंपरा टूट गई है।
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मोहम्मद शारिफ-मिहनाजपुर।
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