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आईएएस चयन में गिरा क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों का ग्राफ

Wed, 12 Feb 2020 02:09 AM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Wed, 12 Feb 2020 02:09 AM IST
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Graph of regional universities dropped in IAS selection
Graph of regional universities dropped in IAS selection
प्रयागराज। संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा में हिंदी हाशिए पर आ गई है और इसका असर क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों पर पड़ रहा है। इससे सीधा नुकसान ग्रामीण पृष्ठभूमि के उन अभ्यर्थियों को रहा है, जो आईएएस-पीसीएस बनने का ख्वाब लेकर इन विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेते हैं। हिंदी एवं अन्य क्षेत्रीय भाषाओं और अंग्रेजी माध्यम के चयनित विद्यार्थियों के नंबरों के औसत में बड़ा अंतर सामने आ रहा है।
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सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा से लेकर इंटरव्यू तक और फिर अंतिम चयन, हर स्तर पर क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं की भागीदारी तेजी से कम हो रही है। इविवि से लेकर छात्रप्रति शाहूजी यूनिवर्सिटी कानपुर, बीएचयू, लखनऊ यूनिवर्सिटी जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों में पूर्वांचल और बिहार के ग्रामीण इलाकों से आकर पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या काफी अधिक है। प्रतियोगी छात्रा शालिनी और उनकी टीम ने जो आंकड़े जुटाए हैं, उसके अनुसार पूर्वांचल और बिहार की ग्रामीण परिवेश के छात्र-छात्राओं में 80 फीसदी से अधिक विद्यार्थी हिंदी माध्यम से ही परीक्षाओं की तैयारी करते हैं।
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आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2010 में इविवि से आईएएस में चयनितों की संख्या 21 थी। वर्ष 2010 में हुए बदलाव के बाद चयनितों की संख्या में तेजी से कमी आई और सिविल सेवा परीक्षा-2018 के अंतिम चयन के आंकड़े बेहद निराशाजनक रहे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मानविकी के विषयों के साथ तैयारी करने वालों की अंतिम चयन में संख्या शून्य हो गई। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक छात्रपति शाहू जी महाराज यूनिवर्सिटी कानपुर के नौ अभ्यर्थी 2010 में चयनित हुए, जबकि 2013 में केवल चार का चयन हुआ। 2018 में आंकड़ा शून्य हो गया। मगध यूनिवर्सिटी बोध गया में वर्ष 2010 से आठ और लखनऊ यूनिवर्सिटी से 11 चयन हुए, जबकि 2013 में क्रमश: एक एवं चार अभ्यर्थियों का चयन हुआ।
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हिंदी माध्यम से कोई नहीं बना कलेक्टर
- वर्ष 2018 की सिविल सेवा परीक्षा में हिंदी माध्यम का कोई अभ्यर्थी कलेक्टर नहीं बन सका। हिंदी एवं अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों के औसत अंकों में बड़ा अंतर देखने को मिला। शालिनी और उनकी टीम की ओर से जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार साढ़े सात सौ से अधिक पदों पर हुई भर्ती के अंतिम चयन परिणाम की मेरिट में शुरुआती 336 चयनित अभ्यर्थी अंग्रेजी माध्यम के थे। हिंदी माध्यम के कुल आठ अभ्यर्थियों का चयन हुआ था और इनमें जो टॉपर था, उसे मुख्य मेरिट में 337वें नंबर पर जगह मिली। उसे कलेक्टर, आईपीएस, आईएफएस जैसा कोई पद नहीं मिला।
विशेषज्ञों के अनुसार इन खामियों से गिरा चयन का ग्राफ
- हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषा के विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य है कि वे मुख्य परीक्षा में हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद का एक पैराग्राफ हल करें, जबकि अंग्रेजी के विद्यार्थियों के लिए ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है कि वह हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषा की जानकारी संबंधी प्रश्न हल करें। जबकि, फील्ड में कार्य करते हुए उन्हें क्षेत्रीय भाषा का ज्ञान होना ही चाहिए।

- इंटरव्यू में क्षेत्रीय भाषा के उम्मीदवार से प्राय: अंग्रेजी भाषा में सवाल किए जाते हैं, जिससे वह मानसिक रूप से सहज नहीं हो पाता।
- सर्व शिक्षा अभियान में क्षेत्रीय भाषा का प्रभाव है, जबकि यूपीएससी की परीक्षा में अंग्रेजी का दबदबा है। ऐसे में जो बेसिक शिक्षा दी जा रही है, उसकी गुणवत्ता सरकारी शिक्षा में ही फेल है।
अभ्यर्थियों के सुझाव
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- क्षेत्रीय भाषा के उम्मीदवार का साक्षात्कार उसी की भाषा में लिया जाए
- मुख्य परीक्षा में अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद को भी अनिवार्य किया जाए
- मुख्य परीक्षा में उत्तर लेखन में विश्लेषण के लिए पर्याप्त अवसर मिले
- किसी एक अंग्रेजी अखबार से आने वाले प्रश्नों का वर्चस्व हटाया जाए
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