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High Court : सिविल मामलों में आपराधिक मुकदमे दर्ज कराना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग

Mon, 23 Dec 2024 05:33 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 23 Dec 2024 05:33 AM IST
सार

आवेदक विवादित जमीन का वास्तविक क्रेता हैं, जिसने बाद में संपत्ति अन्य व्यक्तियों को बेच दी है। खरीददारों में कोई भी धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगाया है। न्यायालय ने उक्त टिप्पणी करते हुए आरोप-पत्र, समन आदेश के साथ-साथ मामले की संपूर्ण कार्यवाही को रद्द कर दिया।

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Filing criminal cases in civil cases is abuse of the process of law
अदालत। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल मामलों में आपराधिक मुकदमे दर्ज कराना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। जमीन खरीद-बिक्री मामले में ठगी होने पर क्रेता ही धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज करा सकता है। आवेदक विवादित जमीन का वास्तविक क्रेता हैं, जिसने बाद में संपत्ति अन्य व्यक्तियों को बेच दी है। खरीददारों में कोई भी धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगाया है। न्यायालय ने उक्त टिप्पणी करते हुए आरोप-पत्र, समन आदेश के साथ-साथ मामले की संपूर्ण कार्यवाही को रद्द कर दिया।

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यह आदेश मंजू रानी चौहान की पीठ ने रमनदीप सिंह व दो अन्य, मुनीष चंद्र मिश्रा, अरविंदर सिंह व 2 अन्य की ओर से दाखिल अर्जी पर दिया। बरेली निवासी आवेदकों पर थाना इज्जत नगर में बरेली विकास प्राधिकरण की ओर से 2022 में फर्जी सेल डीड के आधार पर सरकारी जमीन बेचने का आरोप में विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया था। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बरेली की अदालत के समक्ष वाद लंबित है। इस मुकदमे की पूरी कार्रवाई को रद्द करने के लिए आवेदकों ने हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की।

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आवेेदक रमनदीप सिंह और 2 अन्य के अधिवक्ता पवन किशोर व राहुल अग्रवाल ने दलील दी कि सिविल मामले को आपराधिक रूप दिया गया है। जबकि यह धोखाधड़ी का मामला नहीं है। जमीन की बिक्री के दिन तक आवेदक का नाम खतौनी में दर्ज था। सीलिंग में जमीन सरकार में निहित हो गई। इसके खिलाफ वाद लंबित है। वहीं, बीडीए के अधिवक्ता ने दलील दी कि सीलिंग अधिनियम के तहत अधिसूचना जारी होने के बाद चिह्नित भूमि पूरी तरह से राज्य सरकार में निहित हो जाती है। उसके बाद का कोई भी लेन-देन शुरू से ही अमान्य है। अन्य दलीलें दीं।

न्यायालय ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि सिविल मामलों में आपराधिक मुकदमा चलाना गंभीर मामला है। इससे किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होती है। साथ ही व्यक्ति की प्रतिष्ठा को बड़ा नुकसान पहुंचता है। ऐसे मुकदमे को जारी रखना कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग और मानसिक आघात है। न्यायालय ने दर्ज मुकदमे की संपूर्ण कार्रवाई को रद्द कर दिया।

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