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रेप की शिकार मासूम की इलाज के दौरान मौत
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sun, 15 May 2016 01:46 AM IST
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- फोटो : concept photo
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नवाबगंज इलाके में लगभग 14 माह पहले रेप कि शिकार हुई मासूम ने शनिवार सुबह दम तोड़ दिया। सदमे के चलते बच्ची बोल भी नहीं पा रही थी। उसका मानसिक संतुलन भी बिगड़ गया था। गरीब मां-बाप उसका इलाज करा रहे थे, लेकिन अस्पताल का खर्च अधिक होने के चलते डॉक्टरों ने उसे घर भेज दिया था। हर हफ्ते पिता उसे लेकर इलाज के लिए डॉक्टरों के पास जाते थे। बच्ची की मौत के बाद मां-बाप बिलख रहे थे। सूचना पर नवाबगंज पुलिस पहुंची। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
14 माह 16 मार्च 2015 को नवाबगंज इलाके में एक मजदूर की पांच वर्षीय बेटी घर से कुछ दूर पर खेत में आलू बिनने गई थी। वहीं पर गांव के नंदलाल पाल और पारसनाथ आए और बच्ची को टॉफी दिलाने के बहाने अरहर के खेत में उठा ले गए। नंदलाल ने मासूम के साथ दुराचार किया, जबकि पारसनाथ खेत पर बैठा रहा। इस मामले में नंदलाल और पारसनाथ के खिलाफ नवाबगंज पुलिस ने मुकदमा लिखकर उन्हें जेल भेज दिया।
बच्ची का फाफामऊ के एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा था। घटना के बाद से मासूम की आवाज बंद हो गई थी और सदमे के चलते मानसिक संतुलन बिगड़ गया था। काफी दिन बच्ची अस्पताल में भर्ती रही। गरीब मां-बाप कर्ज लेकर बच्ची का इलाज करा रहे थे, लेकिन जब कर्ज का बोझ अधिक हो गया तो परिजनों ने डॉक्टरों से बच्ची को अस्पताल से निकालने की गुहार लगाई। परिजन बच्ची को घर चले गए। हर सातवें दिन पिता डॉक्टरों को दिखाकर दवा ले जाते थे। शनिवार सुबह बच्ची की सांसें थम गईं। वह दो भाई और एक बहन में सबसे छोटी थी।
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14 माह 16 मार्च 2015 को नवाबगंज इलाके में एक मजदूर की पांच वर्षीय बेटी घर से कुछ दूर पर खेत में आलू बिनने गई थी। वहीं पर गांव के नंदलाल पाल और पारसनाथ आए और बच्ची को टॉफी दिलाने के बहाने अरहर के खेत में उठा ले गए। नंदलाल ने मासूम के साथ दुराचार किया, जबकि पारसनाथ खेत पर बैठा रहा। इस मामले में नंदलाल और पारसनाथ के खिलाफ नवाबगंज पुलिस ने मुकदमा लिखकर उन्हें जेल भेज दिया।
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बच्ची का फाफामऊ के एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा था। घटना के बाद से मासूम की आवाज बंद हो गई थी और सदमे के चलते मानसिक संतुलन बिगड़ गया था। काफी दिन बच्ची अस्पताल में भर्ती रही। गरीब मां-बाप कर्ज लेकर बच्ची का इलाज करा रहे थे, लेकिन जब कर्ज का बोझ अधिक हो गया तो परिजनों ने डॉक्टरों से बच्ची को अस्पताल से निकालने की गुहार लगाई। परिजन बच्ची को घर चले गए। हर सातवें दिन पिता डॉक्टरों को दिखाकर दवा ले जाते थे। शनिवार सुबह बच्ची की सांसें थम गईं। वह दो भाई और एक बहन में सबसे छोटी थी।
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