Chandra Shekhar Azad: तीन गोलियां लगने के बाद भी आजाद ने उड़ा दिया था ब्रिटिश अफसर का जबड़ा
फरवरी 1931 में यूपी के इंस्पेक्टर जनरल रहे हार्लिंस ने अपने एक लेख में इस घटना का विस्तार से वर्णन किया है। अंग्रेजी पत्रिका मेन वनली के अक्तूबर 1954 के अंक में प्रकाशित हार्लिंस के इस लेख से आजाद के साहस और अचूक निशाने का पता चलता है।
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अल्फ्रेड पार्क में अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की शहादत की घटना ऐसा संयोग है, जिसे सुनकर किसी का भी कलेजा कांप उठे। क्रांतिकारी साथियों के साथ बैठक करते समय मुखबिरी पर ब्रिटिश फौज ने उन्हें घेर लिया और गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। तब तीन गोली लगने के बाद भी आजाद ने अपने अचूक निशाने से झाड़ी में छिपकर घात लगाए बैठे अंग्रेज अफसर का जबड़ा उड़ा दिया था।
फरवरी 1931 में यूपी के इंस्पेक्टर जनरल रहे हार्लिंस ने अपने एक लेख में इस घटना का विस्तार से वर्णन किया है। अंग्रेजी पत्रिका मेन वनली के अक्तूबर 1954 के अंक में प्रकाशित हार्लिंस के इस लेख से आजाद के साहस और अचूक निशाने का पता चलता है। हार्लिंस ने भारत में अपनी तैनाती के दौरान हुई इस घटना के संस्मरणों का जिक्र इस लेख में किया है। हार्लिंस के अनुसार पार्क में घिरने के बाद आजाद ने पहली गोली पुलिस सुपरिंटेंडेंट नाट बाबर पर चलाई, जो उसकी बांह में लगी थी।
इस दौरान नाट बाबर के नेतृत्व में झाड़ियों में छिपकर अंग्रेज सिपाही उन पर गोलियां बरसा रहे थे। पुलिस इंस्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह निशाना लेने के लिए झाड़ी के ऊपर से झांक रहा था। तब तक आजाद को तीन गोलियां लग चुकी थीं। ऐसी हालत में भी आजाद ने इंस्पेक्टर के चेहरे को निशाना बनाकर गोली चलाई जो उसके जबड़े को चीरते हुए निकल गई। हार्लिंस ने अपने संस्मरण में आजाद के इस निशाने की सराहना की है। उसने लिखा है कि यह आजाद का अंतिम, लेकिन बहुत प्रशंसा योग्य अचूक निशाना था।
उस दिन चंद्रशेखर आजाद के कटरा स्थित ठिकाने से निकलकर अल्फ्रेड पार्क तक पहुंचने की घटना भी कम हैरतअंगेज नहीं है। आजाद के करीबी रहे कोटवां निवासी क्रांतिकारी शिवमूर्ति सिंह के पौत्र सुबोध कुमार सिंह बताते हैं कि उस दिन आजाद अल्फ्रेड पार्क में क्रांतिकारी सुखदेव राज से मिलने गए थे। वह अपने दादा की सुनाई इस कहानी को आज भी अपने जेहन में संजोए हैं।
वह बताते हैं कि इससे पहले आजाद की मुलाकात उनके दादा शिवमूर्ति सिंह और सुरेंद्र पांडेय से कटरा के उस मकान में हुई थी, जिसमें वह रहा करते थे। सुरेंद्र पांडेय और शिवमूर्ति चौक में स्वेटर खरीदने निकले थे और आजाद सुखदेव राज से मिलने के लिए। उस दौर के क्रांतिकारी यशपाल ने भी अपनी पुस्तक में इस घटना का उल्लेख किया है। यशपाल लिखते हैं कि आजाद को दूसरे दिन ही रूस के लिए निकलना था, क्योंकि उस समय रूस ही क्रांतिकारियों को शरण देने वाला देश था।
रूस जाने की तैयारी जारी थी। 27 फरवरी 1931 की सुबह सुरेंद्र पांडेय और खुद यशपाल स्वेटर खरीदने के लिए कटरा से चौक जाने के लिए तैयार हुए। आजाद ने तब उनसे कहा था कि मुझे अल्फ्रेड पार्क में किसी से मिलना है, साथ ही चलते हैं। तुम लोग आगे निकल जाना। वह तीनों अल्फ्रेड पार्क के सामने से साइकिलों पर जा रहे थे। एक साइकिल से सुखदेव राज पार्क में जाते दिखाई दिए। रूस यात्रा से पहले इलाहाबाद में चंद्रशेखर आजाद की आखिरी बैठक थी।