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आईटीआई में सीटीआई की वरीयता को चुनौती

Tue, 28 Jan 2020 12:43 AM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Tue, 28 Jan 2020 12:43 AM IST
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Challenge of preference of CTI in ITI
आईटीआई में सीटीआई प्रमाणपत्र की वरीयता को चुनौती
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0 दर्जनों याचिकाओं पर हाईकोर्ट में सुनवाई जारी
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में अनुदेशकों की नियुक्ति में सीटीआई प्रमाणपत्र की अनिवार्यता के स्थान पर वरीयता देने के नियम की वैधता को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। इन पर सुनवाई जारी है। बेरोजगार औद्योगिक कल्याण समिति सहित दर्जनों याचिकाओं पर न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा की खंडपीठ सुनवाई कर रही है ।

याचिका पर सोमवार को वरिष्ठ अधिवक्ता अमरनाथ त्रिपाठी ने बहस की। इनका कहना है कि केंद्र सरकार ने 1996 में अनुदेशकों की नियुक्ति के लिए सीटीआई प्रमाणपत्र अनिवार्य कर दिया। नौ दिसंबर 2005 को राज्य सरकार ने नियमों में बदलाव करते हुए सीटीआई प्रमाणपत्र को वरीयता देकर गैर प्रशिक्षित इंजीनियरिंग डिग्री और डिप्लोमा धारकों को भी नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल होने का मौका दिया। इसकी वैधता को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने इस बदलाव को असंवैधानिक घोषित करते हुए आदेश दिया कि केंद्र सरकार द्वारा एनसीवीटी की संस्तुति के आधार पर निर्धारित अर्हता को ही लागू किया जाए। केंद्र सरकार ने अनुदेशकों की नियुक्ति में सीटीआई प्रमाणपत्र अनिवार्य किया है। इस फैसले के खिलाफ विशेष अपील भी खारिज हो गई। राज्य सरकार ने 2014 में नए नियम बनाए, जिसमें अप्रशिक्षित डिप्लोमा, डिग्री धारकों की नियुक्ति के लिए रास्ता खोल दिया है। साथ ही कहा कि नियुक्ति के तीन वर्ष के भीतर वे सीटीआई पत्र हासिल करना होगा। सीटीआई डिग्री की अनिवार्यता को शिथिल करते हुए प्रशिक्षण प्रमाणपत्र धारकों को वरीयता दी गई। इसे याचिकाओं में चुनौती दी गई है। याची का कहना है कि एनसीवीटी की संस्तुति पर केंद्र सरकार के निर्देशों के खिलाफ राज्य सरकार को अनुदेशकों की नियुक्ति के लिए अर्हता निर्धारण करने का अधिकार नहीं है। साथ ही यह हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ भी है।
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