High Court : कर्मचारी की सेवा समाप्ति का आदेश जारी किए बिना वेतन नहीं रोक सकते
जौनपुर के केशवनाथ सीनियर बेसिक स्कूल, होरैया, राम नगर विधमौवा में संजय सिंह व अन्य ने सहायक अध्यापक पद के लिए आवेदन किया था। समिति ने उनके चयन की संस्तुति की। 21 अगस्त 2003 को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने याचिकाकर्ताओं को सहायक अध्यापक के पद पर चयन के लिए स्वीकृति प्रदान की।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त बेसिक स्कूल नियमावली 1978 के तहत जब तक किसी कर्मचारी के खिलाफ कोई प्रतिकूल कार्रवाई या सेवा समाप्ति का आदेश जारी नहीं किया जाता है, तब तक वह सेवा में माना जाएगा। साथ ही वह वेतन पाने का भी हकदार होगा। यह आदेश न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की कोर्ट ने जौनपुर के शिक्षक संजय सिंह व तीन अन्य की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।
जौनपुर के केशवनाथ सीनियर बेसिक स्कूल, होरैया, राम नगर विधमौवा में संजय सिंह व अन्य ने सहायक अध्यापक पद के लिए आवेदन किया था। समिति ने उनके चयन की संस्तुति की। 21 अगस्त 2003 को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने याचिकाकर्ताओं को सहायक अध्यापक के पद पर चयन के लिए स्वीकृति प्रदान की। याचिकाकर्ताओं ने पदभार ग्रहण कर लिया और उन्हें नियमित आधार पर वेतन दिया जाने लगा।
इस बीच 2008 में एक जांच की गई। इसके बाद याचिकाकर्ताओं व राज्य प्राधिकारियों के साथ मिलीभगत का आरोप लगाते हुए सभी का वेतन रोक दिया गया। साथ ही नियुक्त पदों पर काम करने से भी मना कर दिया गया। जांच रिपोर्ट के आधार पर याचिकाकर्ताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई और बाद में आरोप पत्र जारी किए गए। इसके खिलाफ याचियों ने हाईकोर्ट में आवेदन दाखिल किया। इसमें एक अंतरिम आदेश पारित किया गया था। वहीं, वेतन की कटौती से व्यथित होकर याचियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
आरोपों के समर्थन में नहीं पेश किए गए सबूत
याची अधिवक्ता ने दलील दी कि नियुक्तियों को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, जौनपुर ने अनुमोदित किया था। प्रतिवादियों ने नियुक्ति में अनियमितता साबित नहीं कर पाए हैं। वहीं, प्रतिवादियों के वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ताओं को उनके पदों पर नियुक्त करते समय उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त बेसिक स्कूल (जूनियर हाईस्कूल) (शिक्षकों की भर्ती और सेवा की शर्तें) नियम 1978 के विशिष्ट प्रावधानों का पालन नहीं किया गया था। ऐसे में याचियों की नियुक्ति अवैध थी। इसलिए उनका वेतन रोकना उचित है।
न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ताओं पर राज्य प्राधिकारियों के साथ मिलीभगत करने का सिर्फ आरोप लगाया गया है। इसे साबित करने के लिए कोई सबूत पेश नहीं किया गया था। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति को अवैध नहीं कहा जा सकता। क्योंकि, चयन साक्षात्कार जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के नामित व्यक्ति की उपस्थिति में किए गए थे। यह भी कहा गया कि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की संतुष्टि के बाद ही याचिकाकर्ताओं को 21अगस्त 2003 को स्वीकृति दी गई थी।
याचिकाकर्ता बकाया व सभी लाभों के हकदार
कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादियों ने आज तक कोई सबूत पेश नहीं किया है, जिससे पता चले कि 24 मार्च 2008 की रिपोर्ट के अनुसार याचियों के खिलाफ किसी तरह की प्रतिकूल कार्रवाई की गई थी या नहीं। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने याचियों की नियुक्ति देने के आदेश को भी वापस नहीं लिया। न्यायालय ने कहा कि ऐसी स्थिति में अनुशासनात्मक जांच किए बिना सेवा समाप्ति नहीं की जा सकती। न्यायालय ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं को वेतन का बकाया व सभी परिणामी लाभ प्रदान करें, जिनके वे हकदार हैं। कोर्ट ने रिट याचिका को अनुमति दे दी गई।